अरविन्द केजरीवाल की तर्ज पर जयराम महतो ने बनायी अपनी पार्टी, एनडीए और महागठबंधन को नुकसान के ससाथ जयराम सुदेष महतो को भी मात देने की तैयारी में

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मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची : आंदोलन की राह से निकलकर राजनीति के गलियारे में दस्तक देने के लिये खतियानी नेता जयराम महतो ने अपनी नयी पार्टी बनाने की घोषणा के साथ ही राजनीति तूफान झारखंड की राजनीति में ला दिया हैं। जयराम महतो के नयी पार्टी की घोषणा के बाद एनडीए, महागठबंधन और आजसू को खासा राजनीतिक वोटबैंक का खतरा मंडराने लगा है। बीजेपी को महतो वोट बैंक का खतरा जहां दिखाई दे रहा है वहीं झामुमो को भी महतो मांझा और मुस्लिम के समीकरण का टूटने का खतरा है। दूसरी ओर महतो वोटरों को अपना आधार वोट मानकर यचल रहे आजसू को भी काफी नुकसान होने की संभावना दिखाई दे रही है। झारखंड में पिछले तीन सालों से भाषा, नियोजन नीति, डोमिसाइल और नौकरी के सवाल को लेकर छात्र-युवा आंदोलन कर रहे थे। इस आंदोलन का नेतृत्व प्रमुख रूप से झारखंडी भाषा-खतियान संघर्ष समिति की ओर से किया जा रहा था। संगठन का नेतृत्व स्टूडेंट्स लीडर जयराम महतो कर रहे थे। समिति ने अब राजनीति के मैदान में उतरने की घोषणा कर दी है। झारखंडी भाषा-खतियान संघर्ष समिति को एक राजनीतिक दल का रूप देने का फैसला लिया गया। इस दल के अध्यक्ष जयराम महतो होंगे। इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में उपस्थित युवाओं की भीड़ ने झारखंड की सियासत में हलचल पैदा कर दी। यह भीड़ उन छात्र-युवा नेताओं के आह्वान पर जुटी थी, जो राज्य में पिछले तीन सालों से भाषा, डोमिसाइल, नौकरी-रोजगार के सवालों पर आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं।

इस आंदोलन से उभरे सबसे बड़े नेता जयराम महतो ने अब युवाओं की मांग को संसदीय राजनीति के जरिए अंजाम तक पहुंचाने की घोषणा की। धनबाद के तोपचांची इलाके के निवासी जयराम महतो राज्य भर में युवा टाइगर के नाम से जाने जाते हैं।जयराम महतो की अगुवाई वाली नई पार्टी जेबीकेएसएस ने आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। जयराम महतो का कहना है कि शहीदों के अरमानों का झारखंड आज तक नहीं बन पाया है। उनकी पार्टी 1932 के खतियान पर आधारित डोमिसाइल और रिक्रूटमेंट पॉलिसी को लागू कराने तक चुप नहीं बैठेगी। अलग झारखंड राज्य गठन के बाद से ही झारखंड में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव रहा है। प्रमुख क्षेत्रीय दल झारखंड मुक्ति मोर्चा अभी सत्ता में है। इससे पहले बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाली झारखंड विकास मोर्चा, एनोस एक्का की झारखंड पार्टी, समरेश सिंह की झारखंड वनांचल कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दलों ने अपनी ताकत का एहसास कराया है। यह कहा जा सकता है कि क्षेत्रीयता की राजनीति की प्रयोगशाला रहा है। यहां के क्षेत्रीय-स्थानीय मुद्दों को लेकर कई पार्टियां और मोर्चे बनते रहे हैं। छात्रों-युवाओं की इस नई पार्टी को राज्य में एक नए सियासी उभार के तौर पर देखा जा रहा है।

पिछले तीन सालों में झारखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थानीय भाषाओं और 1932 के खतियान पर आधारित डोमिसाइल को लेकर लगातार आंदोलन चल रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा की अगुवाई वाली सरकार ने खुद राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर 1932 के खतियान पर आधारित डोमिसाइल और रिक्रूटमेंट पॉलिसी का बिल पारित किया था। कुछ महीने बाद ही झारखंड हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया। इसके बाद से इस मुद्दे पर राज्य सरकार बैकफुट पर है। लेकिन, जयराम महतो, देवेंद्र नाथ महतो, मनोज यादव सहित कुछ अन्य छात्र-युवा नेताओं की अगुवाई वाले संगठन इसे लेकर लगातार आंदोलन करते रहे। नियोजन नीति और युवाओं को रोजगार की मांग को लेकर इन संगठनों ने पिछले छह महीने में कम से कम दो बार विधानसभा घेराव किया। तीन बार झारखंड बंद बुलाया। राज्य के अलग-अलग इलाकों में दो दर्जन से भी ज्यादा सभाएं हुईं। जयराम महतो ने 50 से ज्यादा जनसभाएं की और हर सभा में हजारों की तादाद में लोग जुटे। यह युवा नेता सोशल मीडिया पर बेहद लोकप्रिय हैं। लेकिन नयी पार्टी की घोषणाक े साथ ही जयराम महतो की प्रतिद्वंदिता बढ़ेगी और राजनीतिक हलकों में इसके परिणाम को लेकर भी चर्चा होगी।

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