
मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांची: झारखंड के ऊर्जा विभाग में पिछले लगभग दो माह से सीएमडी् एवं एमडी जैसे शीर्ष पदों का रिक्त रहना किसी प्रशासनिक भूल का नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गंभीर उदासीनता, निर्णयहीनता और शासन की विफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। यह गंभीर आरोप राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप वर्मा ने लगाया। डॉ. वर्मा ने कहा है कि झारखंड ऊर्जा विकास निगम कोई साधारण विभाग नहीं, बल्कि आपातकालीन सेवा से जुड़ा ऐसा तंत्र है, जिस पर राज्य की जनता, उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा व्यवस्था निर्भर करती हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री के सीधे अधीन विभाग को महीनों तक नेतृत्वविहीन छोड़ देना यह दर्शाता है कि सरकार को न जनता की चिंता है और न ही राज्य की ऊर्जा सुरक्षा की।
उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री स्वयं ऊर्जा विभाग के प्रभारी हैं, तब भी यदि सीएमडी और एमडी जैसे अहम पद खाली हैं, तो यह साफ दर्शाता है कि सरकार चल नहीं रही, बल्कि केवल कागज़ों में चलने का भ्रम पैदा किया जा रहा है।
डॉ. वर्मा ने चेताया कि नेतृत्व के अभाव में
-ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन योजनाएं ठप पड़ी हैं,
-एटी एंड सी लॉस बेकाबू होता जा रहा है,
-उपभोक्ता शिकायतों का ढेर लग चुका है,
-और फील्ड में जान जोखिम में डालकर काम कर रहे अभियंता व कर्मचारी पूरी तरह हताश और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि जिस सरकार से मुख्यमंत्री के अपने विभाग नहीं संभल पा रहे, उससे पूरे राज्य के सुशासन की उम्मीद करना जनता के साथ धोखा है। यह प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि राजनीतिक लापरवाही है।
डॉ. प्रदीप वर्मा ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि शीघ्र ही पूर्णकालिक, सक्षम और जिम्मेदार ब्डक् एवं डक् की नियुक्ति नहीं की गई, तो इसका सीधा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा और झारखंड की बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है। मुख्यमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि अब भाषण और बयानबाज़ी नहीं, ठोस निर्णय चाहिए। ऊर्जा विभाग को नेतृत्वविहीन छोड़ना जनता को अंधेरे में धकेलने जैसा अपराध है, जिसे अब किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। डॉ. वर्मा ने दो टूक यह भी कहा है कि इस गंभीर मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक पूरी ताकत से उठाया जाएगा, और झारखंड की जनता को अंधेरे में रखने वाली सरकार की हर लापरवाही को बेनकाब किया जाएगा।
