पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को 17 नयी बुलेट प्रूफ गाड़ियो ंको लेकर पत्र लिखा, जनता के पैसे की बर्बादी पर जतायी आपत्ति

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मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची: झारखंड की राजनीति में एक बार फिर सरकारी खर्च और वीआईपी सुरक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर 17 नई बुलेट प्रूफ गाड़ियों की खरीद पर सवाल उठाए हैं। इस मुद्दे के सामने आते ही राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है और विपक्ष ने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया है।

बाबूलाल मरांडी ने अपने पत्र में कहा कि झारखंड जैसे राज्य में, जहां आज भी कई इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, वहां इतनी बड़ी संख्या में बुलेट प्रूफ गाड़ियों की खरीद के बाद उसका उपयोग समुचित ढ़ंग से नहीं करना जनता के पैसे की बर्बादी है। गृह विभाग द्वारा वर्ष 2024 के अंतिम महीने में मुख्यमंत्री/पूर्व मुख्यमंत्री/राज्यपाल महोदय के उपयोगयार्थ एवं अति विशिष्ट महानुभावों के आवागमन पर परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिए सुरक्षा के दृष्टिकोण से 17 बुलेट प्रुफ वाहन (फॉर्चूनर) खरीदी गई है। मेरी जानकारी के अनुसार इन 17 नए बुलेट प्रुफ वाहनों में आपके उपयोग हेतु 3 फॉर्चूनर बुलेट प्रुफ वाहन, लोकभवन (राजभवन) को 2 बुलेट प्रुफ वाहन एवं शेष 12 बुलेट प्रुफ फॉर्चूनर वाहन पुलिस मुख्यालय मेें रखा गया है। आपको अवगत कराना चाहूँगा कि हेडक्वार्टर मेें वीआईपी मूवमेंट के नाम पर रखी गई नई बुलेट प्रुफ वाहनों में से 3-4 वाहन ही प्रयुक्त होते हैं, बाकी वाहनों को अन्यत्र रखा गया है, जिसका उपयोग नहीं हो रहा है। बाबूलाल मरांडी ने अपने पत्र में लिखा है कि आपको भी अनुभव होगा कि यदि नए वाहनों का उपयोग लम्बे समय से नहीं हो रहा है, तो वैसे वाहन खराब हो जाता है, फिर प्रयुक्त होने लायक नहीं रह जाता है। यदि इन ठच् वाहनों का उपयोग नहीं हो रहा है तो खरीददारी ही नहीं करनी चाहिए, इससे जनता के पैसे की बर्बादी भी नहीं होती। आपके जानकारी में लाना चाहता हूँ कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को जो बुलेट प्रूफ वाहन उपलब्ध कराया गया, दस-बारह वर्ष पुरानी गाड़ी है एवं लगभग दो लाख कि.मी. चल चुका है, इसकी हालात ठीक नहीं है, आए दस-पन्द्रह दिनों में परिभ्रमण के दौरान खराब होते रहता है। मुझे भी जो बुलेट प्रूफ वाहन आवंटित है, काफी पुरानी है एवं आए दिन खराब होते रहता है। उन्होंने यह भी कहा कि जो वाहन खड़े है उनको बेकार करने के बजाय मुख्य सचिव, डीजीपी जैसे बड़े अधिकारियों को दे दी जायें ताकि वाहन खराब होने के बजाय अच्छे रहे।

पत्र में मरांडी ने यह भी संकेत दिया कि यदि सुरक्षा कारणों से कुछ वाहनों की जरूरत है, तो उनकी संख्या और उपयोग को तर्कसंगत रखा जाना चाहिए। उन्होंने संकेत दिये है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन गाड़ियों का उपयोग किन-किन लोगों के लिए किया जाएगा और क्या यह निर्णय किसी आपात सुरक्षा स्थिति के तहत लिया गया है।
वहीं, सत्तारूढ़ दल के सूत्रों का कहना है कि यह निर्णय राज्य में बढ़ती सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया गया है। उनका कहना है कि झारखंड के कई इलाके अब भी संवेदनशील हैं, जहां वीआईपी मूवमेंट के दौरान खतरा बना रहता है। ऐसे में आधुनिक और सुरक्षित वाहनों की व्यवस्था करना आवश्यक है। सूत्रों के अनुसार, यह कदम सुरक्षा एजेंसियों की सलाह के आधार पर उठाया गया है।
हालांकि, इस मामले में अभी तक मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन माना जा रहा है कि सरकार जल्द ही इस मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट करेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है और विधानसभा के भीतर भी इस पर जोरदार बहस हो सकती है। विपक्ष जहां इसे सरकारी फिजूलखर्ची और प्राथमिकताओं की अनदेखी बता रहा है, वहीं सत्तापक्ष इसे सुरक्षा से जुड़ा जरूरी कदम करार दे रहा है। फिलहाल, इस मुद्दे पर सबकी नजरें सरकार के जवाब पर टिकी हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस आलोचना का किस तरह जवाब देती है और क्या इस फैसले में कोई बदलाव किया जाता है या नहीं।

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