“स्वर्णरेखा बहती रहे” झारखंडी संस्कृति और परंपरा का आईना है: कामेश्वर निरंकुश

Jharkhand झारखण्ड

रांची: कवि कामेश्वर निरंकुश ने कृति के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। इसस पुस्तक में स्वर्णरेखा नदी के अतिक्रमण और उसमें होनेवाले प्रदूषण को लेकर भी जिक्र किया गया है। स्वर्णरेखा कभी झारखंड की लाईफ लाइन कही जाती थी लेकिन कालांतर में उसमें होनेवाले प्रदूषण के कारण स्वर्णरेखा का अस्तित्व भी खतरे में है। मंच के अध्यक्ष व हिंदी साहित्य के स्थापित रचनाकार आदरणीय श्री कामेश्वर निरंकुश की कृति स्वर्णरेखा बहती रही, यह इनकीं सत्रहवीं पुस्तक है।पुस्तक में झारखंड की सभ्यता, संस्कृति के साथ बहुत कुछ लिखा गया है और तमाम स्थितियों को लोकार्पण के दिन पद्मश्री मुकुन्द नायक जी ने जीवन्त कर दिया। आईएमआई भवन रांची करमटोली में वरिष्ठ साहित्यकार कामेश्वर प्रसाद निरंकुश की झारखंड की जनजातीय पृष्ठभूमि पर आधारित काव्य कृति श्स्वर्ण रेखा बहती रहे के विमोचन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री मुकुन्द नायक तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में गिरिधारी राम गोंझू, डाॅ विमला चरण शर्मा, राश दादा राश और रामेश्वर नाथ मिश्र बिहान उपस्थित थे। मंच के कार्यकारिणी सदस्य निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव ने कृति चर्चा करते हुए रचना की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस रचना में लेखक ने झारखंड की लोकवाहिनी संस्कृति की छवियों को कविता के माध्यम से उकेरने में पूर्ण सफलता पायी है। वहीं, डाॅ गिरिधारी गोंझू ने पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत की। डाॅ सविता केशरी ने लेखक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। बंगलुरू से आए राश दादा राश ने कहा कि कवि की दृष्टि समाज की समग्रता पर होती है। उसकी रचनाओं में व्यक्ति, परिवार, समाज, देश, राजनीति, धर्म-संस्कृति आदि सभी विषय आते हैं। बक्सर से आए बिहान ने भी अपने साहित्यिक विचारों से सभा को अवगत कराया। उन्होंने कहा कि कवि कहीं का हो उसकी रचनाओं में माटी की खुशबू और उसके रंगों की छाप अवश्य पड़ती है। मंच के संरक्षक सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति विक्रमादित्य प्रसाद ने अपने उद्गार में कवि निरंकुश की सृजनशीलता की सराहना करते हुए कहा कि निश्चय ही यह रचना पाठकों को झारखंड की सांस्कृतिक विशेषताओं से अवगत कराएगा। की पूरी जिम्मेवारी मंच की ही सदस्या व कवयित्री मुक्ति शाहदेव जी ने झारखंडी लोक पद्धति से नृत्य, गीत के साथ दो दो पुस्तकों का लोकार्पण कराकर मंच का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया। इससे पूर्व अतिथियों ने दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इसके बाद गीत-संगीत से अतिथियों का स्वागत किया गया। मधु मंसूरी हंसमुख ने भी गीत की मार्मिक प्रस्तुति दी। इस अवसर पर आगत कई साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन आकाशवाणी की उदघोषिका शकुंतला मिश्र, स्वागत भाषण मुक्ति शाहदेव और धन्यवाद ज्ञापन मंच के सचिव डॉ वैद्यनाथ मिश्र ने किया। कार्यक्रम का आयोजन डाॅ अभिषेक अभि ने किया। मौके पर मंच के उपाध्यक्ष प्रशांत करण, कोषाध्यक्ष नसीर अफसर, एस के सिन्हा, राजकुमार श्रीवास्तव, विनय सरावगी, डीएन पाठक, यतीश चंद्र यति, डाॅ नीलम कौर, गीता सिन्हा गीतांजलि, अनिता रश्मि, प्रतिभा सिंह, रेणु झा, शिल्पी कुमारी, हैरत फर्रूखाबादी, हिमकर श्याम, हरे राम त्रिपाठी चेतन, कृष्णा विश्वकर्मा, सारिका भूषण, वीरेन्द्र कुमार, कपिलदेव गिरी, सूरज श्रीवास्तव, डाॅ भूपेंद्र नारायण, डाॅ आरके गुप्ता आदि मौजूद थे।

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