
टीवी चैनलों की वजह से बदनाम हो रहा है मीडिया – प्रभू चावला रांची: कभी टीवी पत्रकार बनकर सीधी बात के जरिये सत्ता की चासनी चाटनेवाले वरिष्ठ पत्रकार प्रभू चावला की पहचान जिस टेलीविजन प्.कारिता ने बनायी अब उसी को गाली देने में प्रभू चावला लगे हुए हैं। राजधानी रांची में आयोजित एक प्रतिष्ठित अखबार के सेमिनार में टेलीविजन पत्रकारिता को जमकर खरी खोटी सुनायी। वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने कहा कि टीवी मीडिया में बैठे लोगों ने पत्रकारिता को बदनाम किया है। न्यूज एंकर ज्यादा बोलता है और गेस्ट को बोलने नहीं देता. टीवी चैनल में बैठे एंकर्स के पास सूचना का अभाव होता है. अखबारों को कोई भला-बुरा नहीं कहता। चावला ने कहा कि आज खबर के मायने बदल गये हैं. आज विज्ञापन भी खबर बन गया है. पहले के जमाने में मंत्री और मुख्यमंत्री पत्रकारों और संपादकों से मिलने उनके पास आते थे. आज संपादक ही मंत्री और मुख्यमंत्री से मिलने चला जाता है. उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि आज भी प्रिंट मीडिया पर लोगों का भरोसा कायम है।चावला ने कहा कि लोगों का भरोसा आगे भी कायम रहेगा. उन्होंने कहा कि मीडिया पर पाठकों और दर्शकों का भरोसा इसलिए कम हुआ है, क्योंकि मीडिया सत्ता का साथी बन गया है. मीडिया को सत्ता का विरोधी होना चाहिए। अखबार आज भी सूचना का सबसे विश्वसनीय स्रोत है. मीडिया पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन कभी प्रिंट मीडिया को किसी ने भला-बुरा नहीं कहा. टीवी चैनलों पर बैठकर चीखने-चिल्लाने वाले लोगों ने पत्रकारिता को बदनाम कर दिया है. आने वाले दिनों में पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है. हालांकि, उसके सामने कई चुनौतियां भी हैं. ऐसा नहीं है कि पहले चुनौतियां कम थीं. चुनौतियां पहले भी थीं, अब भी हैं और आगे भी रहेंगी. तमाम चुनौतियों से निबटते हुए पत्रकारिता ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया है और आगे भी अपनी जिम्मेवारियां उसे निभानी होगी। प्रभु चावला ने कहा कि कॉलेज के मेरे कई मित्र आज मंत्री हैं। पहले की सरकार में भी मंत्री थे. मेरी उन मंत्रियों के साथ कभी नहीं बनी, क्योंकि मैंने उनके साथ समझौता नहीं किया। उन्होंने कहा कि आज और पहले की पत्रकारिता में काफी अंतर आ गया है। अब पत्रकारिता मिशन नहीं, प्रोफेशन और बिजनेस बन गया है। उन्होंने कहा कि मार्केटिंग के दबाव में एडिटोरियल तरह-तरह की बेचने वाली खबरें प्रकाशित कर रहा है। मीडिया से विचार नाम की शक्ति गायब होने की वजह से पत्रकारिता प्रोफेशन बनती जा रही है। अब पत्रकारिता में केवल बिजनेस मॉडल की चर्चा हो रही है. अखबरों में बाइलाइन खत्म हो गयी। वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव ने कहा कि आज खबरों के दोनों पहलू नहीं दिखाये जाते. उन्होंने कहा कि हर चीज के दो पहलू होते हैं. लेकिन, हर प्रसंग, हर घटना, हर खबर का एक ही पहलू आज सामने आ रहा है. दूसरे पहलू को मीडिया पूरी तरह से रौंदते हुए निकल जाता है। आखिर मीडिया पाठकों को, श्रोताओं को, दर्शकों को इतना बेवकूफ क्यों समझता है। उन्होंने कहा कि आज की तारीख में नेशनल मीडिया से बेहतर भविष्य क्षेत्रीय मीडिया का है. कहा कि 35 साल के पत्रकारिता में महसूस करता हूं कि आज की डेट में चुनौती सबसे ज्यादा है. तटस्थता और निष्पक्षता ये दो चीजें ऐसी हैं, जिससे भरोसा कायम नहीं हो रहा. उन्होंने पत्रकारिता के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि जब आप इस क्षेत्र में आयें, तो यथार्थ के साथ आयें। उन्होंने कहा कि लाइफ आज इंटेलिजेंट कॉम्प्रोमाइज मेकिंग है. वही आज मीडिया की कहानी है. इसमें 99 फीसदी मीडिया फेल है. वह स्टुपिड कॉम्प्रोमाइज मेकिंग कर रहा है। इमरजेंसी के समय एक मशहूर संपादक ने कहा था कि जब उनसे झुकने को कहा गया, तो लोग लोटने लगे. आज भी वही स्थिति है. उन्होंने कहा कि समय-काल के अनुरूप ढलना ही पत्रकारों का सबसे बड़ा गुण रहा है. नारद के काल से. यह सिर्फ मीडिया के लोगों की समस्या नहीं है. कहा कि यदि आपको आंदोलन करना है, तो अकेले करें. किसने रोका है। श्री श्रीवास्तव ने कहा कि दुनिया बदल रही है. मीडिया में वह बदलाव दिखना चाहिए. उन्होंने कहा कि जिस दौर में वे पत्रकार बने, वह वैसा दौर था, जब लोगों को कोई नौकरी नहीं मिलती थी, तो पत्रकारिता में आ जाते थे. आज के पत्रकार दुनिया से ज्यादा कनेक्टेड हैं. वह ज्यादा पढ़े-लिखे, प्रोफेशनल और समझदार हैं। वरिष्ठ पत्रकार आर राजगोपालन ने 40 वर्षों की पत्रकारिता का अनुभव साझा किया. कहा कि 2014 के बाद पत्रकारिता से उम्मीदें कम हुई हैं. खोजी पत्रकारिता अब बीते दिन की बात हो गयी है. सरकार के खिलाफ खबरों पर अघोषित रोक लगी हुई है. दिल्ली में पत्रकारों को अब कोई सरकारी दस्तावेज नहीं मिलता। उन्होंने धारा 370 का जिक्र करते हुए कहा कि राज्यसभा में आने से पहले किसी भी पत्रकार को इसकी हवा तक नहीं लगी. वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने कहा कि अच्छे कॉपी राइटर की मीडिया में आज भी बहुत कमी है. मीडिया के लोग अपने जमाने को आदर्श युग और स्वर्णिम काल कहते हैं बाद की पीढ़ी के पत्रकारों को बेकार बताते हैं. लेकिन, चुनौतियां तब भी थीं और अब भी हैं. श्री मेहता ने कहा कि ‘प्रभात खबर’ से उनका पुराना नाता है. वे प्रभात खबर के संस्थापक ज्ञानरंजन को भी जानते थे. वह जानते हैं कि ज्ञानरंजन बेहतर अखबार के प्रकाशन को लेकर चिंतित रहते थे और लोगों से इस संबंध में बातें करते रहते थे.उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के सामने असली चुनौती समाचार पत्रों की विश्वसनीयता को बनाये रखना है. पत्रकार का काम अखबार बेचना नहीं है, लेकिन उसे यह देखना चाहिए कि अखबार बांटने वाले हॉकर को समय पर समाचार पत्र बांटने की सहूलियत हो और लोग अखबार खरीदकर पढ़ें।पत्रकारिता में आये हैं, तो तैयार रहिये बिस्तर बांधकर. यदि पैसे ही कमाने हैं, तो पान की दुकान खोल लीजिए. अच्छे पैसे कमा लेंगे. जब हम पढ़ते थे, तो कॉलेज के बाहर पान का ठेला लगाने वाला करोड़पति बन गया. हमने ऐसा कर लिया होता, तो हम भी करोड़पति हो जाते, लेकिन आज भी उतना नहीं कमा पाये. इसलिए यदि आप मीडिया में हैं, तो पूरी शिद्दत के साथ पत्रकारिता करें। समाचार छापने की आप हिम्मत करिये. उसका नतीजा भुगतने का भी साहस रखिये. साथ ही कहा कि शहरों में पत्रकारिता करने वालों को दिक्कत बहुत कम है. जिला स्तर के पत्रकारों के लिए खतरे ज्यादा हैं.
