
रांची से अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची: कांग्रेस के हेमंत सोरेन की सरकार में विधानसभाध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री पद की गुत्थी सुलझ नहीं रही है। इस गुत्थी को सुलझाने के लिये कांग्रेस के आलानेता आज दिल्ली से रांची पहुंच रहे हैं। कांग्रेस के कोटे में विधानसभाध्यक्ष का पद और उपमुख्यमंत्री पद मिलने की संभावना जतायी जा रही है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी आर.पीएन सिंह को केन्द्रीय नेतृत्व रांची भेज रहा है ताकि इन दोनेां ही पदों पर कांग्रेस का कौन सा विधायक फिट बैठ रहा है इसे तय किया जा सके। झारखंड में महागठबंधन सरकार का मुख्यमंत्री तय होने के बाद अब सत्ता पक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती उपमुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष का पद है। अब उपमुख्यमंत्री को लेकर भी चर्चाओं का जोर तेज है। कांग्रेस इस पद के लिए भले ही दावे ठोक रही है लेकिन यहां भी जातिगत समीकरण अड़चन है। कुल मिलाकर कांग्रेस से तीन वरीय लोगों के नाम इन तीन जगहों पर सेट करने का फॉर्मूला तैयार किया जा रहा है। तीन वरिष्ठ विधायकों में रामेश्वर उरांव के साथ-साथ विधायक दल के नेता आलमगीर आलम और पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह शामिल हैं। कांग्रेस जातिगत समीकरण को साधना चाहती है। इसके तहत मुख्यमंत्री आदिवासी बिरादरी से होने के कारण विधानसभा अध्यक्ष दूसरी बिरादरी से होगा। कांग्रेस अध्यक्ष रामेश्वर उरांव के नाम पर भी किसी को आपत्ति नहीं थी लेकिन इससे कांग्रेस का जातिगत समीकरण फिट नहीं बैठ रहा है। आदिवासी और मुसलमान और पिछड़ी जाति के जातिगत समीकरण को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाकर कांग्रेस सभी वर्गों को संदेश देने में सफल हो पाएगी। विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस के सीनियर नेता तैयार होते नहीं दिख रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रामेश्वर उरांव भी विधानसभा अध्यक्ष नहीं बनना चाहते हैं और जूनियर लोगों को यह जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती है। ऐसे में नई संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है।कांग्रेस का एक गुट पार्टी छोड़कर झामुमो से चुनाव लड़नेवाले सरफराज अहमद की पैरवी कर रहा है। सरफराज लंबे समय कांग्रेस में बिता चुके हैं और उनसे कांग्रेस को कोई दिक्कत नहीं होगी। गांडेय से लगातार चुनावी तैयारी कर रहे सरफराज अहमद को चुनाव के पूर्व निराशा हाथ लगी जब बताया गया कि समझौते के तहत गांडेय सीट झामुमो के खाते में जा रही है। इसके बाद उन्होंने झामुमो में शामिल होकर चुनाव लड़ा और जीतकर आए। उनके अध्यक्ष बनने को लेकर चल रही चर्चाओं के पीछे जातिगत समीकरण को कारण बताया जा रहा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वरीय होने के नाते विधानसभा अध्यक्ष के लिए पहली पसंद हैं लेकिन उनका मन इस पद के लिए नहीं मान रहा है। उनके करीबी नेताओं की मानें तो इस प्रकार के ऑफर को वे आराम से ठुकरा देंगे। कांग्रेस का एक धड़ा तो यह चाहता है कि राजेन्द्र सिंह विधानसभाध्यक्ष बने लेकिन उनके समर्थकों के अनुसार राजेन्द्र सिंह ने बखूबी 14 महीने तक मंत्री पद को संभाला था और कांग्रेस के लिये लागातार संकटमोचक बनकर सामने आये थे। राजेन्द्र सिंह फिलहाल दिल्ली दरबार को मंत्री पद के लिये राजी कराने की कोशिश करने में जुट गये हैं। शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस से कम से कम दो मंत्रियों के शपथ लेने की संभावना है। हालांकि यह संख्या अधिक भी हो सकती है। इस चुनाव में कम सीनियर लोगों के जीतने के कारण अभी रेस में कम लोग ही शामिल हैं। इसके अलावा पहली बार जीते नेता अपनी दावेदारी पेश नहीं कर पा रहे हैं। राज्य कांग्रेस में शीघ्र ही नए प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी के लिए चेहरे की तलाश की जाएगी। समझा जा रहा है कि वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष किसी भी हाल में सत्ता का हिस्सा होंगे और वन मैन वन पोस्ट के फॉर्मूले के तहत उन्हें अध्यक्ष पद छोडना होगा। ऐसे में पांच कार्यकारी अध्यक्षों में से किसी एक को अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जा सकती है अथवा किसी नए व्यक्ति की तलाश भी की जा सकती है। मकर संक्राति के बाद इस पर फैसला किया जा सकता है।
