व्यस्त रहनेवाले लोग बयां कर रहे अपना अनुभव , लाॅक डाउन में कड़वे लेकिन जीवन के लिये महत्वपूर्ण रहे अनुभव

Jharkhand झारखण्ड साहित्य-संस्कृति

 

अन्नया दूबे, फिल्म अभिनेत्री

लाॅक डाउन का दौर एक बुरा समय है जो जल्द ही निकल जायेगा: अन्नया दूबे, फिल्म अभिनेत्री

हजारीबाग : हजारीबाग जैसे छोटे शहर से बाॅलीवुड की दुनिया में झारखंड का नाम उंचा करनेवाली अन्नया दूबे, एकता कपूर की कई प्रसिद्ध धारावाहिकों में काम कर चुकी हैं। अन्नया दूबे स्टार प्लस की प्रसिद्ध धारावाहिक ये हैं मोहब्बतें, मिटेगी लक्ष्मण रेखा में महत्वपूर्ण किरदार की भूमिका अदा करके अपनी पहचान बनायी है। अन्नया दूबे मुम्बई से हजारीबाग आयी तभी कोरोना संक्रमण के दौर में लाॅक डाउन लगाने की घोषणा हुई। लाॅक डाउन के दौर में घर से बाहर निकलना काफी मुश्किल हो गया। ऐसे में लाॅक डाउन का पालन करते हुए अभिनेत्री अन्नया दूबे अपने अनुभव मुखर संवाद से साझा कर रही हैं। आप भी जानियें कि अन्नया दूबे ने लाॅक डाउन के दौर में क्या अनुभव किये। अन्नया दूबे कहती हैं कि:-‘‘ इस लॉकडाउन में पहली बार बिना काम के टेंशन लिए फैमिली के साथ टाइम स्पेंड करने का मौका मिल रहा है। मुझे 1 साल हो गया था होमटाउन हजारीबाग आए हुए तो मुझे यह टाइम यह मोमेंट अच्छा लग रहा है। मेरे जो प्रिय है उन से कनेक्ट होने का वापस मौका मिला । इस लॉकडाउन में मैं योगा करके टाइम स्पेंड कर रही हूं । मैं साउथ इंडियन मूवी की बहुत बड़ी फैन हूं, तो फिर तो अपना काफी समय वह मूवी देखने में बिता रही हूं । मैं नेटफ्लिक्स में वेब सीरीज भी फॉलो कर रही हूं । हां, काम को भी मिस कर रही हूं लेकिन कोरोना से इतना डर है कि खुद को जितना सिर्फ रख रही हूं क्योंकि खुद की सेफ्टी बहुत जरूरी है । खुद को पॉजिटिव भी रख रही हूं क्योंकि यह एक फेज है निकल जाएगा। आप सभी इस पेज को भी पॉजिटिवली हैंडल करें । मुझे यकीन है हम इस पेज से जल्द बाहर आ पाएंगे । व्यस्त शूटिंग की वजह से काफी कुछ रह जाता था, जो मैं नहीं कर पाती थी, वही सब करके टाइम स्पेंड कर रही हूं । लॉकडाउन में स्पिरिचुअल भी हुई हूं । अभी मानसून का टाइम है और बारिश इंजॉय कर रही हूं । भुट्टे का मजा ले रही हूं । हां अपने खाली टाइम में फोटोशूट भी कर रही हूं काफी ऐसी चीज है जहां में अपना टाइम वेस्ट कर रही हूं । हां अपने खाली टाइम में फोटोशूट करना बहुत अच्छा लगता है। मुझे फोटो क्लिक करवाना बहुत पसंद है इसलिए मैं यह भी कर रही हूं । ईमानदारी से कहूं तो ऐसा बहुत कुछ डिफरेंट नहीं कर रही हूं । कुछ चीजें काफी नॉर्मल है जो काफी लोग कर रहे हैं । सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण चीज खुद को इस फेज में भी पॉजिटिव रखना है। सबसे महत्वपूर्ण है यह है कि हम अपने घर में सकून से रहे । सकून से सो रहे हैं और ईश्वर की बड़ी मेहरबानी है कि हम सब सुरक्षित हैं। इससे बड़ी कुछ भी बात नहीं है। ‘‘

कामेश्वर प्रसाद निरंकुश – अध्यक्ष, झारखंड हिन्दी साहित्य संस्कृति मंच

 

कफस में है जिन्दगी: कामेश्वर प्रसाद निरंकुश
बेंगलुरु: झारखंड हिन्दी साहित्य संस्कृति मंच के अध्यक्ष कामेश्वर प्रसाद निरंकुश लाॅक डाउन के दौर में बेंगलूरू में फंसे हुए हैं। कामेश्वर प्रसाद निरंकुश साहित्य को जीते हैं और साहित्य ही उनके जीवन का प्रमुख आधार है। हालंाकि ऐसे में कवि को कविताओं का मंच से कहना संभव नहीं हो पा रहा है लेकिन वह साहित्य को आत्मसात कर अपने भविष्य का सपना भी बूनते हैं। कामेश्वर प्रसाद निरंकुश अपने अनुभव मुखर संवाद से बंगलूरू से ही साझा कर रहे हैं। निरकंुश लिखते हें कि ‘‘ आज चार महीना हो गया मुझे बैंगलोर में रहते। मैं 04 मार्च को रांची से बैंगलोर पहुंचा। मेरे बैंगलोर प्रवास में ही कोरोना वायरस का प्रकोप देखने को मिला। इस महामारी के बढ़ने पर मैंने लॉकडाउन लगते देखा। अन्य शहरों कि तुलना में यहां की स्थिति बहुत अच्छी थी। इसकारण हमलोग महामारी से बचने के लिए सुझाए गए निर्देश का अनुपालन करते हुए अपने कमरे में ही बंद रहा करते थे। बंद कमरे में तरह तरह के विचार उठते हैं। समाचार पत्र कुछ दिनों तक आया बाद में वह भी उपलब्ध नहीं होता रहा था। तब मानस पटल पर बहुत सारे प्रश्न उभरने लगे। विचार आया क्यों न इस विकट घड़ी को साकार बनाया जाए। जो हर कला में दक्ष हो और हर कल्पना में रंग भर दें वहीं कलाकार होता है उसी प्रकार हर परिस्थिति में मुखर होकर जीवन के संस्कृति से परिचय कराना ही तो साहित्यकार का काम होता है। इस विकट काल में जब लोग जीने और बसर को लेकर फिक्रमंद हैं, वहीं मैंने एक साहित्य साधक के नाते इस जीवटता के समय को धैर्य और रचनात्मकता में व्यतीत करना उचित समझा और उसी में लग गया। जो भी प्रतिदिन घटित होते हुए देखता था उसे काव्य के रूप में रचने लगा। अपने घर से लेकर समाज की, बेंगलुरु जैसे फूलों की महानगरी की, राजनीतिक स्थिति की, डॉक्टर्स के कर्मठता की, कुछ कर्तव्य विमुख लोगों के घिनौनी हरकत की, पुलिस के द डयूटी की, फुटपाथ पर प्रतिदिन कुछ न कुछ बेचने से लाचार मजबूरी की, भूख के ज्वाला की यानी हर स्थितियों को अपनी कलम से उकेरने के लिए अनवरत लगा रहा। और देखते देखेते यहां लगाए गए 68 दिनों के लॉकडाउन में लगभग 80 कविताएं और 25 लघु कथाएं लिख डाली। और मैंने उसे पुस्तककार के रूप में चयन कर प्रकाशित करने का विचार रखा। प्रकाशक से दिल्ली संपर्क करने पर वे तैयार भी हो गए। जिसें सभी जल्द हीं पढने वाले है उस पुस्तक का नाम कफस में जिन्दगी कविताएं लॉकडाउन की है। इसमें 71 कविताएं हैं। कफस का अर्थ हीं पिंजरा होता है और जिन्दगी का केन्द्र बिन्दु हीं स्वतंत्रता होती है जीवन के पड़।व पर यदि पिंजरा जीवन की गतिविधियों में लग जाए तो जीवन व्यर्थ सा लगता है और जब साहित्यकार के नजरिए से देखा जाए तो वो संघर्ष के आलम होते है जिसमें स्वतंत्रता का अर्थ समझने समझाने के लिए होता है । वो मृत्यु का भी स्वागत कर सकता है क्योंकि स्वतंत्रता का एक बोध मृत्यु भी है इसलिए सरहद पर भी सैनिक जश्न मनाते है मृत्यु के तांडव का। साहित्यकार के पास कलम होता है वह उससे लड़ता हैं हर हालात में सैनिक अपने हथियार से लड़ता है हर परिस्थिति में दोनों का हथियार पिंजरे से बंधे होते है साहित्यकार के विचार से और जवान के कर्तव्य बोध से ।
68 दिनों के बाद स्थिति सामान्य होने पर कुछ ढील दी गई। पर अचानक बाजार में बढ़ती भीड़, गाड़ियों की जमघट बिना मतलब के लोगों के बाहर निकलने का परिणाम यह निकला कि एक दिन में सबसे बड़ा आंकड़ा यह आया की 1,839 नए पॉजिटिव निकले जिनमें 42 मरीजों की मौत हो गई। बेंगलुरु में पहली बार 1000 से ज्यादा मामले मिले। रोक – थाम के लिए सरकार ने सख्ती लगाई। बाजार बन्द कर दिया गया। परिवहन सेवाओं का परिचालन ठप क दिया गया। आवश्यक सेवाओं को छूट पहले को भांति ही रहेगी। बेवजह घूमने वालों पर कार्रवाई प्रारम्भ हो गई है। कोरोना अनलॉक के बाद राज्य में पहली बार शनिवार रात 8 बजे से लॉकडाउन शुरु हुआ जो सोमवार सुबह 5 बजे तक रहा। 27 जून को ही सरकार ने बढ़ते संक्रमण के कारण साप्ताहिक लॉक डाउन की घोषणा की थी। 2 अगस्त तक प्रत्येक शुक्रवार की रात्रि से रविवार को लॉकडाउन रहेगा यह घोषणा हुई। स्थति में सुधार नहीं होने बल्कि अधिक बिगड़ जाने कारण यहां 14 जुलाई से 23 तक जुलाई तक हर दिन लॉकडाउन लगा दिया गया है। त्राहिमाम की स्थिति हो गई है।”

 

लाॅकडाउन ने हमे परिवार के पास लाकर खड़ा कर दिया जहां से हम दूर गये थे: स्वाति राय

 


स्वाति राय, संचालक, ग्लोबल इंवेंट

रांची  : अपने पेशे में धनबाद की रहनेवाली स्वाति राय राजधानी रांची में इवेंट कंपनी संचालित करती हैं। काम के सिलसिले में स्वाति राय को दूसरे शहरों में जाना पड़ता रहता है। भागदौड़ भरी जिन्दगी में स्वाति राय को राजधानी रांची में ही रहना पड़ा जहां से वह पुराने रिश्तों को याद कर अपने-अपन में खो जाती हैं। स्वाति राय ने मुखर संवाद से लाॅक डाउन के दौर में अपने अनुभव साझा किये। स्वाति राय कहती हैं कि ‘‘ बेशक यह मुश्किल की घड़ी है हम सब पर साथ ही साथ यह कहना चाहूँगी ,यह पूरी तरह हमारे ऊपर निर्भर करता है हम चीजों को किस प्रकार अपने ऊपर हावी होने देते है , इसे सकारात्मक तौर से लिया जाए तो उन्नति कि दरवाजे खोल सकते है वही अगर नकारात्मक सोचे तो शायद हम जिस कार्य में निपुण थे वो भी करने में असफल हो जाए ।समय है धैर्य से इस कठिन दौर में संयम बनाए रखने की ।
मैं इस मुश्किल घड़ी से गुजारने की पीड़ा को समझते हुए यह कहना चाहती हूँ, कठिन समय हमें बहुत सारे अनुभव सीख जाते हैं। अनेक दरवाजे खोल देते है । हमारे अंदर छिपे हुए प्रतिभा को बाहर लाने में माद्दा करते है । हम अगर चुनाव सही करे तो इस मुश्किल दौर में खुद को ओर अपने परिवार को पॉजिटिव रख सकते है। मेरा मानना है यदि हम यह ना सोच कर अपने प्रतिभा को निखारने में लग जाए तो शायद हमें समय ना मिले ओर देखते ही देखते यह दौर से भी तेजी से निकल जाएँगे। यह लाॅक डाउन ही है जिसने रिश्तों के अहमियत को एक बात और बढ़ा दिया जहां हम टेक्नाॅलजी सर्वेयर बन चुके थे। परिवारगण, दोस्तगण से काफी दूर चले गए थे , वही इस लाॅक डाउन ने इस दूरी को कम कर दिया साथ ही साथ एहसास भी करवाया उनके अहमियत की ।”

 

 

 

 

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