बिहार चुनाव के पहले थारू समाज को रिझाने का पूरा प्रयास किया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात में

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मुखर संवाद के लिये मनोहर यादव की रिपोर्ट-

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने थारू समाज को याद करके उनकी भूमिका को अपने मन की बात में जिक्र कर उनको रिझाने का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाॅकडाउन का जिक्र करते हुए थारू समाज की भूमिका को लेकर काफी प्रशंसा कर उनका दिल जितने का काम किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में बिहार के पश्चिम चंपारण के थारू समुदाय के प्रकृति प्रेम और इस प्रेम के कारण लगाए जाने वाले लॉकडाउन की चर्चा की। बिहार में थारू समाज के लगभग 3 लाख मतदाता है और कई विधानसभा क्षेत्र में वह निर्णायक भूमिका अदा कर रहे हेंै।यह चर्चा पहले भी हो चुकी है कि देश-दुनिया के लिए लॉकडाउन का अनुभव भले ही नया हो, लेकिन बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के थारू समाज के लिए यह सदियों पुराना है। प्रकृति की पूजा करनेवाला यह समाज सदियों से लॉकडाउन की परंपरा को अपनाए हुए है। पेड़-पौधों की सुरक्षा के लिए थारू समाज के लोग हर साल सावन माह के अंतिम सप्ताह में 60 घंटे का लॉकडाउन करते हैं। स्थानीय भाषा में इसे बरना कहा जाता है। क्‍योंकि वनवासयों की दिनचर्या और जीवकोपार्जन प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर रहता है। इसलिए बरना के दौरान लॉकडाउन की घोषण कर घर से कोई बाहर नहीं निकलता। इस समय एक तिनका तक तोड़ने की मनाही होती है। पश्चिम चंपारण जिले के 214 राजस्व गांवों में 2.57 लाख थारू रहते हैं। उनका जीवन प्रकृति के रंग में रंगा है। इसकी रक्षा के लिए वे हर साल बरना मनाते हैं। इस दौरान लोग घरों में बंद हो जाते हैं। गांव से कोई भी व्यक्ति बाहर नहीं जाता और न ही प्रवेश की अनुमति होती है। समाज के लोग मानते हैं कि बरसात में प्रकृति की देवी पौधे सृजित करती हैं। इसलिए गलती से भी धरती पर पांव पड़ने से कोई पौधा समाप्त न हो जाए, इसका पूरा ख्याल रखा जाता है। हर गांव में बैठक कर बरना की तिथि तय की जाती है। जनसहयोग से राशि जुटाकर अराध्य देव बरखान (पीपल का पेड़, एक तरह से प्रकृति का प्रतिरूप) के पूजन की तैयारी होती है। जिस दिन से 60 घंटे का बरना शुरू होता है, उस दिन सुबह गांव के हर घर से कम से कम एक सदस्य पूजन स्थल पर पहुंचता है। महिलाएं हलवा-पूड़ी का भोग लगाकर प्रकृति की देवी से समुदाय की सुरक्षा की मन्नत मांगती हैं। इसके बाद युवा गांव के सीमा क्षेत्र में भ्रमण कर करआव ,जंगल से लाई गई जड़ी-बूटी) जलाकर वातावरण को शुद्ध करते हैं। थारुओं के गांव तरूअनवा, देवरिया, बरवा कला, भड़छी, लौकरिया, छत्रौल, संतपुर, सोहरिया, चंपापुर, महुआवा, बेरई, कअहरवा, बेलहवा, अमवा, भेलाही, बलुआ, बनकटवा आदि में इसकी तैयारी चल रही है। थारू समाज में इसे लकर यह चर्चा का विषय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके समाज के योगदान को याद किया है। वहीं विपक्षी राजद के नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इसे प्रोपगांडा करार दे रहे हैं। ओबरा विधानसभा क्षेत्र के नेता श्यामदास सिंह के अनुसार ,पीएम नरेन्द्र मोदी को यह पहले से मालूम होना चाहिये कि थारू समाज प्रकृति का उपासक है और इससे पहले पीएम को उनकी याद नहीं आयी। थारू समाज को झांसे में लेने के लिये पीएम की ओर से उनका जिक्र किया गया है जबकि थारू समाज की भाई के लिये उन्होनें क्या किया है इसे उनको बताना चाहिये ।

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