पटना से अशोक कुमार की रिपोर्टः-
पटना: भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री भूपेन्द्र यादव भाजपा के अंदर सफलता की वह मुहर बन गये हैं जहां वो जाते हैंे वहां सफलता चलकर आती है। झारखंड,गुजरात और बिहार में उन्होंने अपना लोहा सभी से मनवाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी भूपेन्द्र यादव की रणनीति के कायल हैं क्योंकि गुजरात में भाजपा को सफलता मुश्किल लग रही थी वहीं बिहार के अंदर नीतिश कुमार का जादू फिका पड़ गया था। भूपेन्द्र यादव ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा के अंदर उनका कोई जोड़ न हो लेकिन मृदूभाषी भूपेन्द्र यादव कभी भी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं करते लेकिन उनकी रणनीति का कोई तोड़ नहीं है। लोकसभा चुनाव 2019…में बिहार की 40 में से 39 सीटें भाजपा की झोली में, इन 39 में से अकेले भाजपा को 17 सीटें। फिर आया 2020 यानि कोरोना काल, इसी में बिहार विधानसभा चुनाव हुए और नतीजों में बीजेपी ने अपना प्रदर्शन न सिर्फ सुधारा बल्कि गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। वो बीजेपी जो बिहार में नीतीश के सामने हमेशा छोटे भाई की भूमिका में बनी रही, उस पार्टी ने इस बार अपना कद इतना ऊंचा किया जिसकी उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन बिहार चुनाव में बीजेपी के बड़े चाणक्य अमित शाह के बाद छोटा चाणक्य वो शख्स बना जो राजस्थानी है लेकिन 5 साल में उसने बिहारी बनकर पार्टी को अर्श पर पहुंचा दिया। राजस्थानी पृष्ठभूमि के भूपेंद्र यादव को 5 साल पहले जब बिहार बीजेपी का प्रभारी बनाया गया था तो लोगों के मन में कई सवाल थे। क्या राजस्थान की रेत से बिहार की मिट्टी में कमाल हो सकता है। क्या भूपेंद्र यादव खांटी बिहारी बन कर पार्टी को शिखर पर पहुंचा पाएंगे। इन सारे सवालों का जवाब भूपेंद्र यादव ने बिहार के दो चुनावों में दे दिया। मेहनत का असर दिखा लोकसभा 2019 के चुनाव में जब मोदी रथ पर सवार छक्। 40 में से 39 सीटें बटोर ले गया। लेकिन भूपेंद्र यादव की नजर लोकसभा से ज्यादा बिहार विधानसभा की 243 सीटों पर थी। आखिर में 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में भूपेंद्र यादव ने भाजपा का झंडा बुलंद कर दी दिया। राजस्थान की रेत से लाई गई कमल ने बिहार की मिट्टी में भी 74 सीटों के साथ पहली बार बड़ी पैठ जमा ली। इससे पहले गुजरात में भाजपा की लगातार छठी बड़ी जीत के भी सबसे अहम रणनीतिकार भूपेंद्र ही थे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में भी भाजपा की धमाकेदार वापसी में भूपेंद्र की बड़ी भूमिका रही थी। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट भूपेंद्र यादव ने 5 साल में बिहार में सभी समीकरणों और एग्जिट पोल तक को नेस्तनाबूद कर दिया। 2016 में ही भूपेंद्र यादव ने यादव समाज के नित्यानंद राय को बिहार बीजेपी की कमान सौंपवा दी। इससे उन्होंने त्श्रक् को ये संदेश दिया कि ल् यानि यादव समीकरण सिर्फ लालू के भरोसे ही नहीं रहनेवाला। अपने मिशन बिहार की शुरुआत भूपेंद्र यादव ने यहीं से की थी। इसी ब्लूप्रिंट के चलते लोकसभा चुनाव में एनडीए का डंका बज गया। लेकिन अभी चाल बाकी थी। 2020 चुनाव से पहले उन्होंने वैश्य समाज के संजय जायसवाल को आगे किया और ये संदेश दिया कि सुशील मोदी के आगे जहां और भी है। ये भूपेंद्र के हुकुम का इक्का था। इससे भूपेंद्र ने धोनी की तरह विराट कोहली का विकल्प दे दिया, यानि पार्टी की दूसरी और नई लाइन ही तैयार कर दी। आखिरी दांव टिकट बंटवारे का था, इसमें भी भूपेंद्र ने माहिर खेल दिखाया और पार्टी के कमजोर विधायकों की पहचान की, साथ-साथ वो जीत दिलाने वाले तगड़े उम्मीदवारों की लिस्ट भी तैयार करते गए। इस दांव ने तो भूपेंद्र की रणनीति को खेल में काफी आगे ला दिया। नतीजा सबके सामने है। बिहार में भाजपा को बड़ा भाई बनाने का तमगा मंगलवार को भूपेंद्र यादव ने हासिल कर लिया। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और बतौर बिहार व गुजरात प्रभारी पांच वर्षों में भूपेंद्र यादव अपने हर मिशन में कामयाब साबित हुए। सीधे तौर पर कहें तो भूपेंद्र का विजय रथ हैट्रिक लगाने में सफल रहा। प्रभारी के तौर पर पहली सफलता उन्हें 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव में मिली थी। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में भाजपा ने सौ फीसद परिणाम हासिल किया। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाकर भूपेंद्र ने इतिहास रच दिया। अहम यह कि इससे पहले गुजरात में भाजपा की लगातार छठी बड़ी जीत के सबसे अहम रणनीतिकार भूपेंद्र ही रहे थे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में भी भाजपा की वापसी में भूपेंद्र की बड़ी भूमिका रही थी। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता भूपेंद्र यादव का नाम भाजपा में कुशल संगठनकर्ता के साथ चुनावी रणनीति के शीर्ष शिल्पकारों में शुमार है। बिहार में लगातार पांच वर्षों की जमावट में भूपेंद्र ने सभी समीकरणों को ध्वस्त कर दिया। 2016 में भाजपा के यादव चेहरा के रूप में नित्यानंद राय को अध्यक्ष बनाकर भूपेंद्र ने बड़ा संदेश दिया था। यहीं से मिशन बिहार में भूपेंद्र जुट गए थे। इसी रणनीति की बदौलत लोकसभा चुनाव में एनडीए का डंका बजाने में सफल हुए थे। अगली कड़ी में उन्होंने वैश्य समाज से आने वाले डॉ. संजय जायसवाल को बिहार भाजपा की कमान सौंप कर तुरुप का पत्ता चल दिया। यह रणनीति भी भूपेंद्र के लिए सोने पर सुहागा जैसा साबित हुआ। इसके साथ ही भूपेंद्र बिहार भाजपा में दूसरी श्रेणी के नेताओं को उभारने में सफल साबित हुए। आखिर में टिकट बंटवारे के दौरान भाजपा के तमाम कमजोर विधायकों और टिकट के दावेदारों को चिह्नित कर जिताऊ प्रत्याशियों पर दांव लगाकर दूरदर्शिता का परिचय दिया।
