मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची : राज्यपाल रमेश वैस छत्तीसगढ़ के रायपुर से कई बार सांसद बने और केन्द्र में अटलबिहारी बाजपेयी सरीसे राजनीतिक सुचिता वाले प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्री भी रहे लेकिन अब तक उनको संवैधानिक मर्यादा को लेकर संयमित रहना नहीं आया। राज्यपाल जैसे गरिमामयी पद पर बैठकर समय-समय पर ऐसे ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे राजभवन की भद पीटती रह रही है। राज्यपाल छोटे और हल्की बातें करें इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो लेकिन राज्यपाल रमेश वैस ने समय-समय पर हल्की बातें कर राज्यपाल की गरिमा धूल धूसरित कर रहे हैं। राज्यपाल के बयानों के कारण पिछले तीन महीनों से झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त है।
राजनीतिक उलटफेर की आशंकाओं के बीच झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने बात ही बात में रायपुर में एक मीडिया इंटरव्यू में बड़ा इशारा किया है। दीवाली की चर्चा आगे कर राज्यपाल ने कहा कि झारखंड में पटाखा बैन नहीं है। संभव है कि एटम बम फटे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले को राज्यपाल रमेश बैस ने एक बार फिर तूल दे दिया है। छत्तीसगढ़ में एक निजी मीडिया चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा-इस मामले में निर्वाचन आयोग से दोबारा मंतव्य मांगा है। आयोग के मंतव्य को मानने को वे विवश नहीं हैं। जब तक पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाते, कोई भी फैसला सुनाने को बाध्य नहीं हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली में पटाखा बैन है, लेकिन झारखंड में नहीं। झारखंड में एक-आध एटम बम फट सकता है। इससे पहले राज्यपाल ने कहा था कि आयोग का लिफाफा इतनी मजबूती से चिपका है कि वह खुल ही नहीं रहा।
इस बीच उन्होंने चुनाव आयोग से हेमंत सोरेन की सदस्यता और अयोग्यता के मसले पर दोबारा मंतव्य मांगा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विधानसभा की सदस्यता को लेकर ऊहापोह की स्थिति पिछले दो महीने से बनी हुई है। लंबी सुनवाई के बाद 25 अगस्त को भारत निर्वाचन आयोग ने गवर्नर को मंतव्य दे दिया था, एक बार फिर चुनाव आयोग के पाले में गेंद डाल दी गई है। राज्यपाल ने कहा कि जबतक वे संतुष्ट नहीं हो जाते, तबतक किसी तरह का आर्डर करना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग से सेकेंड ओपिनियन आने के बाद तय करेंगे कि आगे क्या करना है। हेमंत सोरेन के मसले पर फैसला लेना मेरे अधिकार क्षेत्र में है। इसके लिए कोई मुझे बाध्य नहीं कर सकता।
इस वर्ष फरवरी महीने में भाजपा के प्रतिनिधिमंडल ने पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने राज्यपाल से हेमंत सोरेन के पत्थर खनन लीज की शिकायत की थी। भाजपा ने इसे जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन बताते हुए उनकी विधानसभा की सदस्यता खत्म करने की मांग की थी। राज्यपाल ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से मंतव्य मांगा। आयोग ने अगस्त में ही अपना मंतव्य राजभवन भेज दिया। लेकिन, अब तक फैसला नहीं आया है। इससे असमंजस की स्थिति है।
इस मुद्दे को लेकर यूपीए और झामुमो का प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिला था। हेमंत सोरेन ने भी राज्यपाल से मुलाकात की थी और जल्द फैसला सुनाने का आग्रह किया था। बाद में सीएम ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि अगर वे दोषी हैं, तो सजा दी जाए। पर, बगैर सजा सुनाए ही उन्हें सजा दी जा रही है। ऐसे में झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन इस राजनीतिक अस्थिरता में राज्यपाल रमेश वैस की भूमिका बड़ी दिखाई देती हुई नजर आ रही है। राज्यपाल रमेश वैस के कारण पिछले तीन महीने से राजनीतिक अस्थिरता का दंश झेलने को विवश है। राज्यपाल केन्द्र के नमुइंदे के रूप में संघीय व्यवस्था में राज्य और केन्द्र के बीयच सेतू का काम करता है जिससे संघीय व्यवस्था पर आस्था बढ़ती है लेकिन रमेश वैस के कार्यकलापों और बयालनों से ऐसा प्रतीत होता है कि झारखंड का नुकसान करने की प्रवृति रखकर ही रमेश वैस कार्य कर रहे हैं जिसे आनेवाले दिनों में गलत अवधारणा के रूप में याद रखा जायेगा।
