युवा पीढ़ी ज्ञान के साथ संस्कारी भी बनें, यह हमारी चेष्टा रही है जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से फलित हो रही – ओमप्रकाश सिंह

Jharkhand झारखण्ड शिक्षा जगत साहित्य-संस्कृति

मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांची: राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारतीय ज्ञान परंपरा दोनों परस्पर पूरक हैं। चारों वेद, उपवेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक, पिटक ग्रंथ की जो परंपरा रही है इन सबसे भारत का मानस निर्मित होता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जो आधारभूत तत्व हैं वे सब इन्हीं ग्रंथों में अंतर्निहित है। बतौर मुख्य अतिथि बी आर शंकरानंद ने कहा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति ज्ञान, पराक्रम और त्याग के भारतीय जीवन मूल्य से अनुप्राणित है। यह सर्वे भवन्तु सुखिनरू, सर्वं खलुमिदं ब्रह्मं, योगरू कर्मसु कौशलम और तेन त्यक्तेन भुंजिथा के आदर्श आत्मसात करती है। यह मानव संसाधन की जगह मानव बनाने पर बल देती है।’

डॉ. ओमप्रकाश सिंह, विशिष्ट अतिथि ने कहा है कि भारतीय शिक्षण मंडल शिक्षा और संस्कार के लिए काम करता है। युवा पीढ़ी ज्ञान के साथ संस्कारी भी बनें, यह हमारी चेष्टा रही है जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से फलित हो रही है।
कुलपति प्रो. (डॉ.) अंजिला गुप्ता ने कहा है कि बोधायन, कात्यायन, चरक, सुश्रुत, याज्ञवल्क्य, मैत्रेयी, स्वामी विवेकानंद, रवींद्र नाथ टैगोर के विचार भारतीय ज्ञान की वास्तविक भूमि हैं। इस पर केन्द्रित राष्ट्रीय शिक्षा नीति ज्ञान को दीवारों और जड़ पाठ्यक्रमों से मुक्त करती है। एकेडमिक मोबिलिटी और मल्टीपल एंट्री एक्जिट एक परिवर्तनकारी कदम है। यह सीखने और रोजगार के बीच के अंतराल को पाटती है।

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