आदिवासी वोटों पर एकाधिकार करने के मकसद से हेमंत सोरेन ने पेसा कानून की दी स्वीकृति, कांग्रेस और बीजेपी हाथ मल रही है क्रेडिट लेने के लिये

Jharkhand झारखण्ड देश राजनीति


मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड में पेसा कानून कैबिनेट से पारित कराकर मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है जिसके आगे कांग्रेस और बीजेपी भी कुछ बोल नहीं पा रही है। बीजेपी के लगातार हमलावर रहने के पीछे की मंशा आदिवासी समाज को अपने साथ लेने की थी लेकिन हेमंत सोरेन ने उनसे यह मौका भी छीन लिया है। पेसा कानून के नियम को स्वीकृत करने का हेमंत सोरेन सरकार का फैसला राजनीतिक गलियारे में बड़े राजनीतिक दांव के रूप में देखा जा रहा है। वर्षों से लंबित इस कानून को लेकर भाजपा राज्य सरकार पर आदिवासी अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाती रही है।
अब पेसा के क्रियान्वयन की स्वीकृति से सरकार ने न केवल इन आरोपों की धार कुंद की है, बल्कि विपक्ष के हाथ से एक बड़ा चुनावी और राजनीतिक मुद्दा भी छीन लिया है।यह कानून भारत के उन आदिवासी इलाकों के लिए बनाया गया है जिन्हें अनुसूचित क्षेत्र कहा जाता है. इसका मकसद है कि आदिवासी समुदाय को अपने क्षेत्र में ज्यादा अधिकार और खुद का शासन चलाने की ताकत मिले। इस कानून को इसीलिए बनाया गया था ताकि पंचायती राज व्यवस्था के नियम-कानूनों को अनुसूचित क्षेत्रों में भी लागू किया जा सके. ये अनुसूचित क्षेत्र वो इलाके हैं जहां ज्यादातर आदिवासी समुदाय रहते हैं. दरअसल, पहले, इन इलाकों को 73वें संविधान संशोधन से बाहर रखा गया था, जिस संशोधन से पूरे देश में पंचायती राज संस्थाएं बनाई गई थीं। इसी के बाद पेसा कानून बनाया गया. जिसका मकसद आदिवासी समुदायों को स्वशासन (अपना राज खुद चलाने) का अधिकार देना है। यह उन्हें ग्राम सभाओं के जरिए सशक्त करता है, ताकि वो अपने संसाधनों और मामलों का खुद प्रबंधन कर सकें. चंपई सोरेन ने आदिवासी समाज से अपील की थी कि वो एकजुट होकर अपनी परंपरा, पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए आंदोलन करें, जैसे हमारे पूर्वज बाबा तिलका मझी, सिधो-कान्हो, पोटो हो, चंद भैरव और बिरसा मुंडा ने किया था। उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि सरकार आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को मजबूत नहीं करना चाहती, बल्कि उन्हें अबुआ-अबुआ यानी सिर्फ अपने तक सीमित रखना चाहती है ताकि कोई सवाल न उठा सके। इस आरोप का भी जवाब हेमंत सोरेन ने अब दे दिया है।

पेसा कानून को केंद्र सरकार ने वर्ष 1996 में अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को स्वशासन और निर्णय लेने का अधिकार देने के उद्देश्य से बनाया था। इसका मूल मकसद यह था कि ग्राम सभाएं जल, जंगल और जमीन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अंतिम निर्णय लेने में सक्षम हों।झारखंड गठन के बाद से ही इस कानून के नियमों को लेकर असमंजस और टालमटोल की स्थिति बनी रही। अलगदृअलग सरकारें आईं और गईं, लेकिन पेसा को जमीन पर उतारने की ठोस पहल नहीं हो सकी। भाजपा ने इस मुद्दे को हेमंत सोरेन सरकार को घेरने की रणनीति अपनाई थी। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास इसे लेकर खासे हमलावर रहे थे। उनका आरोप था कि सरकार आदिवासी हितों की बात तो करती है, लेकिन पेसा जैसे अहम कानून को लागू करने में गंभीर नहीं है। ऐसे में जब सरकार ने आखिरकार इसके नियम लागू करने का फैसला किया तो राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आने लगे।यह फैसला हेमंत सोरेन सरकार के लिए मास्टर स्ट्रोक साबित हो सकता है। झारखंड की राजनीति में आदिवासी वोट बैंक की अहम भूमिका रही है और पेसा उसी वर्ग से सीधे जुड़ा मुद्दा है। इसके जरिए सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों को जमीन पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध है। इससे सत्तारूढ़ गठबंधन को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। पेसा के प्रभावी क्रियान्वयन से अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को वास्तविक शक्ति मिलेगी। अब खनन, भूमि हस्तांतरण, स्थानीय संसाधनों के उपयोग, शराब नीति, विकास योजनाओं की स्वीकृति और परंपरागत अधिकारों की रक्षा जैसे मामलों में ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होगी।

इससे आदिवासी समाज को अपने भविष्य से जुड़े फैसलों में सीधी भागीदारी का अवसर मिलेगा और बाहरी हस्तक्षेप पर अंकुश लगेगा। इसके ईमानदार और पारदर्शी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना होगा। यदि प्रशासनिक स्तर पर ढिलाई हुई या ग्राम सभाओं को वास्तविक अधिकार नहीं मिले तो विपक्ष को फिर से सरकार को घेरने का मौका मिल सकता है। ग्राम सभाओं के सदस्यों को उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों की जानकारी देना, प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षित करना और निर्णय प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना बेहद जरूरी होगा। सरकार ने इस संदर्भ में निर्णय लेकर एक साथ दो लक्ष्य साधने की कोशिश की है। एक, आदिवासी स्वशासन को मजबूत करना और दूसरा, भाजपा से पेसा जैसे एक बड़ा राजनीतिक हथियार छीन लेने का मकसद था। वहीं अब पूरी तरह से हेमंत सोरेन इसका क्रेडिट ले बैठे हैं जिससे बीजेपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस में भी चिन्ता की लकीर दिख रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *