
मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची: झारखंड मुक्ति मोर्चा की राजनीतिक भागीदारी अब राज्य की सीमाओं से बाहर विस्तार लेती दिख रही है। असम और बंगाल में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर हेमंत सोरेन ने रणनीतिक नजर टिकाई है। आदिवासी राजनीति के राष्ट्रीय विस्तार की संभावनाओं को टटोलते हुए उन्होंने दोनों राज्यों में जमीनी स्थिति का आकलन करने के निर्देश पार्टी नेताओं को दिए हैं। संकेत साफ हैं कि झामुमो आने वाले समय में पूर्वाेत्तर और बंगाल की आदिवासी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। असम में हेमंत सोरेन की रुचि का मुख्य कारण वहां बड़ी संख्या में रह रहे झारखंडी मूल के आदिवासी हैं। करीब सौ वर्ष पूर्व झारखंड क्षेत्र से हजारों आदिवासी मजदूर असम के चाय बागानों में काम करने गए थे। आज भी उनकी पीढ़ियां वहीं रह रही हैं, लेकिन अब तक उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिल सका है। हाल ही में असम में रह रहे झारखंडी मूल के आदिवासियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात कर अपनी समस्याओं से अवगत कराया। इस मुलाकात के बाद हेमंत सोरेन ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने का संकेत दिया है। उन्होंने असम में आदिवासियों की सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए झारखंड से एकउच्चस्तरीय शिष्टमंडल भेजने का निर्णय लिया है।
असम में सक्रियता को केवल सामाजिक सरोकार तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसका एक सियासी संदेश भी है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिससरमा 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा के सह प्रभारी थे और उन्होंने लगभग चार महीने तक झारखंड में कैंप कर माहौल बनाने की कोशिश की थी। अब हेमंत सोरेन की असम में संभावित भूमिका को उसी का राजनीतिक जवाब माना जा रहा है। झामुमो के भीतर इसे आदिवासी अस्मिता और अधिकारों के सवाल पर भाजपा को घेरने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी नेताओं को निर्देश दिया गया है कि वे असम में आदिवासी वोटरों की संख्या, प्रभाव और स्थानीय संगठनों की भूमिका का विस्तृत आकलन करें। जनवरी के पहले सप्ताह में मंत्री चमरा लिंडा, सांसद विजय हांसदा, विधायक एमटी राजा असम जाएंगे।
वहीं पश्चिम बंगाल में भी झामुमो की नजर झारखंड से सटे आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर है। पुरुलिया, बांकुड़ा, मिदनापुर और जंगल महल जैसे इलाकों में आदिवासी मतदाताओं की अच्छी खासी तादाद है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, झामुमो लगभग एक दर्जन विधानसभा सीटों पर गंभीर तैयारी कर रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में इन इलाकों में भाजपा ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया था। ऐसे में झामुमो इस बार खुद को एक मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश में है। बंगाल में झामुमो की रणनीति तृणमूल कांग्रेस के साथ संभावित तालमेल पर भी टिकी है। पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच तालमेल नहीं हो पाया था, हालांकि हेमंत सोरेन ने ममता बनर्जी के आग्रह पर तृणमूल उम्मीदवारों के लिए प्रचार जरूर किया था। इस वर्ष की शुरुआत में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुलाकात भी हुई थी। दोनों नेताओं के बीच अच्छे संबंध हैं। ऐसे में झामुमो आदिवासी इलाकों में अपनी पकड़ का हवाला देकर ममता बनर्जी पर सीटों के तालमेल का दबाव बना सकता है। फिलहाल असम और बंगाल, दोनों ही राज्यों में झामुमो की तैयारियां प्रारंभिक स्तर पर हैं। जमीनी रिपोर्ट, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक संभावनाओं के आकलन के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। लेकिन इतना तय है कि आदिवासी राजनीति को राष्ट्रीय पटल पर ले जाने की दिशा में यह हेमंत सोरेन का अब तक का सबसे बड़ा कदम साबित हो सकता है।
