
मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांची: झारखंड की सियासत ने रविवार को एक बार फिर ऐसा सदमा झेला, जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर आम लोगों तक को गहरे दुख में डुबो दिया। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री और गिरिडीह विधायक सुदिव्य कुमार सोनू के आकस्मिक निधन ने राज्य की राजनीति को झकझोर कर रख दिया। शनिवार देर रात अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। हृदयाघात को उनकी मौत का कारण बताया गया है। सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के साथ झारखंड में शिक्षा विभाग से जुड़े मंत्रियों की असमय विदाई का एक बेहद पीड़ादायक सिलसिला सामने आया है। जगरनाथ महतो के बाद रामदास सोरेन और अब सुदिव्य कुमार सोनूकृतीन ऐसे चेहरे, जिन्होंने शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली और पद पर रहते हुए दुनिया को अलविदा कह दिया। इसे महज एक संयोग कहा जा सकता है, लेकिन लगातार हुई इन मौतों ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में गहरी चिंता जरूर पैदा की है।
’’जगरनाथ महतो की सरलता आज भी याद’’

जगरनाथ महतो झारखंड की राजनीति में जमीन से जुड़े और बेहद मिलनसार नेता के तौर पर अपनी अलग पहचान रखते थे। उनका सहज और शालीन व्यवहार विरोधियों को भी अपना बना लेता था। शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने कई मौकों पर बच्चों, शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर सक्रियता दिखाई। कोरोना संक्रमण के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई। लंबे इलाज के बाद 6 अप्रैल 2023 को चेन्नई में उनका निधन हो गया। उनकी विदाई झारखंड की राजनीति के लिए गहरी व्यक्तिगत क्षति थी।
’’रामदास सोरेन भी नहीं रहे’’

जगरनाथ महतो की मौत के करीब दो साल बाद शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे रामदास सोरेन का भी असमय निधन हो गया। 15 अगस्त 2025 को इलाज के दौरान उन्होंने दिल्ली में अंतिम सांस ली। ग्राम प्रधान से राजनीति की मुख्यधारा तक पहुंचे रामदास सोरेन की पहचान संघर्षशील जननेता के रूप में रही। उनके निधन ने एक बार फिर झारखंड को झकझोर दिया।
’’अब सुदिव्य सोनू की अचानक विदाई’’
सुदिव्य कुमार सोनू की पहचान जुझारू और बेबाक नेता की रही। राजनीतिक मुद्दों पर उनका अंदाज स्पष्ट और कई बार तल्ख भी नजर आता था। सदन से लेकर सड़क तक वे अपनी बात खुलकर रखने के लिए जाने जाते थे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के करीबी सहयोगियों में उनकी गिनती होती थी। मुख्यमंत्री ने उनके निधन को निजी क्षति बताते हुए कहा कि सोनू के जाने से उनके जीवन में ऐसी रिक्तता पैदा हुई है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। सुदिव्य सोनू का जाना इसलिए भी अधिक मार्मिक है कि शनिवार को ही उन्होंने शिक्षक दिवस से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था। कुछ ही घंटे बाद अचानक तबीयत बिगड़ी और जिंदगी ने उन्हें हमेशा के लिए छीन लिया।
’’सात साल में सत्ता ने खोए कई साथी’’
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में पिछले करीब सात वर्षों के राजनीतिक दौर में सरकार ने कई वरिष्ठ सहयोगियों को खोया है। इनमें शिक्षा विभाग से जुड़े तीन मंत्रियों की असमय मौत का सिलसिला विशेष रूप से झकझोरने वाला है। यह किसी एक सरकार या दल की नहीं, बल्कि पूरे झारखंड की राजनीतिक और सामाजिक दुनिया की क्षति है। राजनीति में मतभेद होते हैं, विचारों में टकराव होता है, लेकिन किसी जनप्रतिनिधि की अचानक मौत इन तमाम सीमाओं को खत्म कर देती है। जगरनाथ महतो की शालीन मुस्कान, रामदास सोरेन का संघर्ष और सुदिव्य सोनू का बेबाक अंदाज अब सिर्फ यादों में रह गया है। झारखंड की राजनीति में इन तीनों नेताओं की कमी लंबे समय तक महसूस होती रहेगी। सत्ता के गलियारों में कुर्सियां बदलती रहेंगी, विभागों की जिम्मेदारियां किसी और के कंधों पर आ जाएंगी, लेकिन जिन लोगों ने इन कुर्सियों पर बैठकर अपनी पहचान बनाई, उनकी जगह शायद कभी नहीं भर पाएगी।
