
मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांची: झारखंड और छत्तीसगढ़ में सामने आए कथित शराब घोटाले की जांच को लेकर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक घटनाक्रम सामने आया है। दोनों राज्यों की सरकारों ने इस मामले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने से साफ इनकार कर दिया है। राज्य सरकारों का कहना है कि वे अपनी-अपनी जांच एजेंसियों के माध्यम से मामले की जांच करने में सक्षम हैं और केंद्र की एजेंसी को सौंपने की कोई आवश्यकता नहीं है। सूत्रों के अनुसार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में शराब के निर्माण, वितरण और बिक्री से जुड़े ठेकों में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि आबकारी नीति में हेरफेर कर कुछ चुनिंदा कंपनियों और ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान हुआ। इस मामले को लेकर विपक्षी दल लगातार सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे।
राज्य सरकारों का तर्क है कि यह मामला राज्य का विषय है और कानून-व्यवस्था तथा आबकारी जैसे विषय राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। सरकारों ने स्पष्ट किया है कि आर्थिक अपराध शाखा , एंटी करप्शन ब्यूरो और अन्य राज्य स्तरीय जांच एजेंसियां पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही हैं। यदि किसी भी स्तर पर दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। वहीं, विपक्षी दलों ने सरकार के इस फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सीबीआई जांच से इनकार करना यह दर्शाता है कि सरकार कुछ प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि चूंकि मामला अंतरराज्यीय स्तर से जुड़ा हुआ है और इसमें बड़े वित्तीय लेन-देन की आशंका है, इसलिए निष्पक्ष जांच के लिए केंद्रीय एजेंसी को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में और तूल पकड़ सकता है। दोनों राज्यों में शराब नीति पहले से ही विवादों में रही है और अब जांच एजेंसी को लेकर खींचतान से राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। वहीं, आम जनता इस मामले में पारदर्शी और निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है ताकि सच्चाई सामने आ सके। फिलहाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ सरकारों ने दोहराया है कि वे कानून के अनुसार कार्रवाई करेंगी और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। आने वाले दिनों में राज्य स्तरीय जांच की प्रगति और उस पर सामने आने वाले निष्कर्षों पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
