
मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
कोडरमाः झारखंड की राजनीति में अगर दलबदल का चेहरा ढूंढा जाए, तो कोडरमा की शालिनी गुप्ता का नाम सबसे ऊपर लिया जा सकता है। सत्ता और समीकरणों के हिसाब से रंग बदलने की राजनीति में उन्होंने एक बार फिर नया अध्याय जोड़ दिया है। कमल के बाद अब तीर-धनुष संभालने के दावे के साथ उन्होंने राजनीतिक नैतिकता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। शालिनी गुप्ता का यह ताज़ा दलबदल साफ संकेत देता है कि उनके लिए विचारधारा नहीं, अवसर सर्वाेपरि है। समर्थकों के बीच खुद को जननेता बताने वाली शालिनी गुप्ता ने भले ही इसे “जनहित में लिया गया फैसला” बताया हो, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे सत्ता की तलाश में की गई पलटी करार दे रहे हैं।
विपक्षी दलों ने इस कदम पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि शालिनी गुप्ता ने दलबदल को ही अपनी राजनीति बना लिया है। नेताओं का कहना है कि जो नेता बार-बार दल बदलता है, वह जनता का नहीं बल्कि सिर्फ अपनी कुर्सी का भरोसेमंद होता है। स्थानीय स्तर पर भी इस फैसले को लेकर नाराज़गी देखी जा रही है। कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि हर चुनाव से पहले नया झंडा थाम लेना कोडरमा की जनता के साथ राजनीतिक छल है। सत्ता की चासनी में डूबकर सत्ता के लाभ लेने की मंशा से ही शालिनी गुप्ता ने झामुमो का तीर धनुष थामा है। कोडरमा में झामुमो का कोई वजूद नहीं है लेकिन शालिनी गुप्ता ने महिला आयोग में अपनी भूमिका की तलाश में ही हेमंत सोरेन के साथ हो ली है।
अब सवाल यह नहीं है कि शालिनी गुप्ता किस दल में हैं, बल्कि यह है कि अगला दलबदल कब और किस तरफ होगा। फिलहाल उनका यह कदम कोडरमा की राजनीति में हलचल तेज़ कर चुका है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में रहने वाला है।
कोडरमा की राजनीति में अगर किसी चीज़ की स्थिरता है, तो वह है शालिनी गुप्ता का अस्थिर राजनीतिक सफर। सत्ता की हवा जिधर बहती है, उधर रुख करने में माहिर शालिनी गुप्ता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनके लिए दल नहीं, दिशा बदलना ही स्थायी विचारधारा है।
पहले कमल थामा, अब पूरे आत्मविश्वास के साथ तीर-धनुष संभालने का दावा-और कल क्या होगा, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल नहीं। राजनीतिक गलियारों में लोग इसे दलबदल नहीं, बल्कि रूटीन प्रोसेस मानने लगे हैं।
शालिनी गुप्ता हर बार की तरह इस बार भी इसे “जनहित” से जोड़ रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि
क्या जनहित हर बार नया झंडा मांगता है? या फिर सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए विचारधारा बोझ लगने लगती है?
विपक्ष ने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। राजद के नेताओं ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि शालिनी गुप्ता ने कोडरमा को विकास नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रयोगशाला बना दिया हैकृजहां हर चुनाव से पहले नया फार्मूला आजमाया जाता है। स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भी नाराज़गी है। उनका कहना है कि जो नेता बार-बार पाला बदलता है, वह जनता का प्रतिनिधि कम और राजनीतिक पर्यटक ज़्यादा लगता है। शालिनी गुप्ता के एक बार फिर दल बदलने पर विपक्ष ने तीखा हमला बोलते हुए इसे राजनीतिक अवसरवाद की पराकाष्ठा करार दिया है। विपक्षी नेताओं ने साफ आरोप लगाया कि शालिनी गुप्ता के लिए न कमल मायने रखता है, न तीरदृधनुषकृउनके लिए सिर्फ सत्ता और टिकट अहम है।
राजद के वरिष्ठ नेता रामधन यादव ने बयान जारी कर कहा, “शालिनी गुप्ता ने कोडरमा की जनता को बार-बार ठगा है। हर चुनाव से पहले नया झंडा, नया दावा और वही पुराने वादेकृयही उनकी राजनीति की पहचान बन चुकी है। जिनके पास कोई स्थायी विचारधारा नहीं होती, वे बार-बार दलबदल करते हैं।” उन्होंने आगे आरोप लगाया कि शालिनी गुप्ता ने जनता के मुद्दों को पीछे छोड़कर व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा को प्राथमिकता दी है।
“आज कमल छोड़ तीरदृधनुष, कल कोई और निशान-यह जनसेवा नहीं, बल्कि राजनीतिक सौदेबाज़ी है,”। ऐसे नेताओं के कारण लोकतंत्र कमजोर होता है और जनता का भरोसा टूटता है। “कोडरमा को स्थिर और ईमानदार नेतृत्व चाहिए, न कि ऐसा नेता जो हर बार हवा का रुख देखकर रंग बदल ले,” बयान में कहा गया। अंत में विपक्ष ने जनता से अपील की कि वे बार-बार पाला बदलने वालों को जवाब दें और इस तरह की राजनीति को आने वाले चुनाव में सबक सिखाएं। फिलहाल इतना तय है कि कोडरमा की राजनीति में अगर कोई चीज़ सबसे तेज़ चलती है, तो वह है शालिनी गुप्ता की पार्टी बदलने की रफ्तार।
