
मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांची: जमुआ की भाजपा विधायक मंजू कुमारी द्वारा अपने क्षेत्र की समस्याओं को लेकर पथ निर्माण विभाग के प्रधान सचिव सुनील कुमार से मुलाकात के दौरान उक्त अधिकारी के अहंकार पूर्ण रवैए पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने झारखंड में कुछ मनबढू अधिकारियों का रवैया तानाशाह जैसा बताया है।
झारखंड की राजनीति में एक बार फिर प्रशासनिक व्यवहार को लेकर विवाद गहरा गया है। जमुआ विधायक के साथ राज्य के पथ निर्माण विभाग के प्रधान सचिव द्वारा कथित रूप से किए गए अमर्यादित और अहंकारी व्यवहार पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस पूरे प्रकरण को गंभीर बताते हुए कहा कि झारखंड में कुछ मनबढ़ू अधिकारियों का रवैया तानाशाही जैसा होता जा रहा है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक संकेत नहीं है। बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार न केवल अपमानजनक है, बल्कि यह प्रशासनिक मर्यादाओं का भी उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि विधायक जनता की आवाज होते हैं और यदि उनके साथ इस तरह का बर्ताव किया जाएगा तो यह सीधे तौर पर जनता का अपमान माना जाएगा। मरांडी ने आरोप लगाया कि राज्य में कुछ अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं और खुद को जनप्रतिनिधियों से ऊपर समझने लगे हैं।
उन्होंने आगे कहा कि लोकतंत्र में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय बेहद आवश्यक होता है, लेकिन हाल के घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि कुछ अधिकारी इस संतुलन को बिगाड़ने का काम कर रहे हैं। मरांडी ने राज्य सरकार से मांग की कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोहराई न जाएं।
सूत्रों के अनुसार, यह विवाद उस समय सामने आया जब जमुआ विधायक मंजू कुमारी किसी विकास कार्य को लेकर प्रधान सचिव के कार्यालय पहुंची थी। इस घटना के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है और विपक्ष सरकार पर हमलावर हो गया है।
विपक्ष का कहना है कि राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है और अधिकारी बेलगाम हो गए हैं। वहीं सत्तापक्ष की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के विवाद सरकार और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी को उजागर करते हैं। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसका असर विकास कार्यों और शासन व्यवस्था पर पड़ सकता है। फिलहाल, यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। वहीं विपक्ष की नजर अब इस बात पर टिकी है कि सरकार इस पूरे प्रकरण पर क्या कार्रवाई करती है और क्या प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है।
