आदिवासी महाजुटान रैली बनी कांग्रेस की ताकत का प्रदर्शन, परिसीमन के बहाने राजनीतिक संदेश देने की कोशिश

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मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची: राजधानी रांची में पूर्व मंत्री और कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बंधु तिर्की की ओर से आयोजित आदिवासी महाजुटान रैली ने रविवार को राजनीतिक रंग ले लिया। आदिवासी मुद्दों को लेकर आयोजित इस रैली में कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं की मौजूदगी ने इसे पार्टी के बड़े शक्ति प्रदर्शन में बदल दिया। बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी के बीच कांग्रेस ने परिसीमन और खान-खनिज संशोधन विधेयक के विरोध को आदिवासी हितों से जोड़ते हुए केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने का प्रयास किया। रैली में कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के. राजू और प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश समेत पार्टी के कई नेता शामिल हुए। मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की भी रैली को सफल बनाने के लिए लगातार सक्रिय रहीं। कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी और पार्टी कार्यकर्ताओं की व्यापक भागीदारी से यह संदेश देने की कोशिश हुई कि आदिवासी मुद्दों को लेकर पार्टी सड़क पर उतरने को तैयार है। रैली का मूल उद्देश्य आदिवासी समाज की एकजुटता और उनके अधिकारों को लेकर आवाज बुलंद करना बताया गया, लेकिन आयोजन में कांग्रेस नेताओं की सक्रिय भागीदारी ने इसके राजनीतिक प्रभाव को बढ़ा दिया। कांग्रेस की कोशिश इस रैली के जरिये आदिवासी समाज के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की दिखी।

रैली में चर्च की ओर से भी लोगों से शामिल होने का आह्वान किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद बड़ी संख्या में ईसाई आदिवासियों के साथ अन्य लोगों की भागीदारी भी देखने को मिली। कांग्रेस ने इस व्यापक भागीदारी को आदिवासी हितों के मुद्दे पर सामाजिक एकजुटता के तौर पर प्रस्तुत किया। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो झारखंड की राजनीति में आदिवासी मतदाता लंबे समय से निर्णायक भूमिका में रहे हैं। ऐसे में परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने आदिवासी समाज के बीच यह संदेश देने की कोशिश की कि भविष्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकती है। रैली में पहुंचीं सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि वे आदिवासियत को बचाने और अपनी ताकत को याद करने के लिए जुटे हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड की लड़ाई में एक-एक आदिवासी की हिस्सेदारी रही है। उन्होंने परिसीमन को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सीटें घटाई गईं तो आर-पार की लड़ाई होगी। उन्होंने कहा कि झारखंड में आदिवासियों के लिए 28 सीटें हैं और यदि परिसीमन किया जाता है तो आदिवासियों की सीटों में दो गुना वृद्धि होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि परिसीमन के नाम पर आदिवासियों को कमजोर या खत्म करने का प्रयास हुआ तो आंदोलन के जरिये इसका विरोध किया जाएगा। हालांकि, परिसीमन को लेकर अभी कई स्तरों पर राजनीतिक और संवैधानिक प्रक्रियाएं बाकी हैं। ऐसे में रैली में उठे सवालों का बड़ा हिस्सा संभावित भविष्य की राजनीतिक स्थिति को लेकर आशंकाओं पर आधारित रहा। कांग्रेस ने इन्हीं आशंकाओं को आदिवासी अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़ने की कोशिश की। रैली में खान एवं खनिज से जुड़े संशोधन विधेयक का भी विरोध किया गया। कांग्रेस का तर्क है कि खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में आदिवासी हितों और स्थानीय समुदायों की भूमिका को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से खासा महत्वपूर्ण माना जाता है।

कुल मिलाकर आदिवासी महाजुटान रैली सामाजिक मुद्दे से आगे बढ़कर कांग्रेस के राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में उभरी। पार्टी ने परिसीमन, आदिवासी अधिकार और खनिज संसाधनों को एक साथ जोड़कर केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रैली में उठाए गए मुद्दे सड़क के आंदोलन में कितनी मजबूती से बदलते हैं और कांग्रेस को आदिवासी समाज के बीच इसका कितना राजनीतिक लाभ मिलता है।

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