कांग्रेस ने उठाई समन्वय समिति गठन की मांग, हेमंत सरकार में बढ़ते विवादों के बीच तेज हुई सियासी हलचल

Jharkhand झारखण्ड देश बिहार राजनीति


मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांचीः झारखंड की महागठबंधन सरकार में समन्वय और बेहतर तालमेल सुनिश्चित करने को लेकर कांग्रेस ने एक बार फिर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष कॉर्डिनेशन (समन्वय) कमेटी के गठन की मांग तेज कर दी है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि सरकार और गठबंधन के घटक दलों के बीच नियमित संवाद के लिए समन्वय समिति का गठन अब आवश्यक हो गया है। पार्टी का तर्क है कि ऐसी समिति बनने से न केवल सरकार के कामकाज में पारदर्शिता और समन्वय बढ़ेगा, बल्कि गठबंधन के भीतर समय-समय पर उभरने वाले मतभेदों को भी प्रभावी ढंग से सुलझाया जा सकेगा।
कांग्रेस का कहना है कि विधानसभा चुनाव में गठबंधन की जीत में उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को अब तक सरकार से जुड़े विभिन्न बोर्ड, निगम, आयोग और अन्य संस्थाओं में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका है। पार्टी नेताओं का मानना है कि यदि समन्वय समिति का गठन होता है तो विभिन्न पदों पर नियुक्तियों, संगठन और सरकार के बीच तालमेल तथा गठबंधन के साझा एजेंडे पर बेहतर तरीके से निर्णय लिए जा सकेंगे।

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि समन्वय समिति के अभाव में कई मुद्दों पर कांग्रेस और झामुमो के बीच संवाद की कमी महसूस की जा रही है। कई बार सरकार के फैसलों को लेकर कांग्रेस के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी भी जताई है। ऐसे मामलों में यदि कोई औपचारिक समन्वय तंत्र मौजूद हो तो विवाद सार्वजनिक होने से पहले ही उनका समाधान निकाला जा सकता है। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व चाहता है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता अथवा उनके प्रतिनिधित्व में गठित समन्वय समिति में गठबंधन के सभी प्रमुख दलों के वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया जाए। समिति समय-समय पर बैठक कर सरकार की प्राथमिकताओं, विकास योजनाओं, राजनीतिक मुद्दों और संगठनात्मक अपेक्षाओं पर चर्चा करे। इससे गठबंधन के भीतर विश्वास भी मजबूत होगा और निर्णय प्रक्रिया अधिक सहभागी बनेगी।

कांग्रेस का यह भी मानना है कि सरकार और संगठन के बीच बेहतर संवाद से प्रशासनिक फैसलों का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि उन्हें विभिन्न संस्थाओं में जिम्मेदारी मिलेगी तो वे सरकार की योजनाओं को आम जनता तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचा सकेंगे। साथ ही कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ेगा, जो भविष्य के चुनावों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गठबंधन सरकारों में समन्वय समिति की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। ऐसी समितियां सहयोगी दलों के बीच संवाद बनाए रखने, नीतिगत मतभेद दूर करने और राजनीतिक असहमति को समय रहते सुलझाने का मंच प्रदान करती हैं। झारखंड की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में भी इस तरह की व्यवस्था सरकार की स्थिरता और प्रभावी संचालन के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
फिलहाल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से समन्वय समिति के गठन को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। हालांकि कांग्रेस की ओर से लगातार उठ रही इस मांग ने राज्य की सियासत में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। अब राजनीतिक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री इस मांग पर क्या निर्णय लेते हैं और क्या महागठबंधन सरकार के भीतर बेहतर तालमेल के लिए जल्द कोई नई पहल देखने को मिलती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *