डुमरी विधायक जयराम महतो और 4 .32 करोड़ के सरकारी बंगले को लेकर सियासी उलझन, जयराम महतो की सोशल मीडिया पर हो रही है फजीहत

Jharkhand


मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांचीः झारखंड के डुमरी विधानसभा सीट से निर्वाचित विधायक जयराम महतो की 4 .32 करोड़ रुपये कीमत वाले सरकारी बंगले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि पहले उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि वे सरकारी आवास नहीं लेंगे और इसे खर्चीला बताते हुए छात्रों की हितैषी योजनाओं के पक्ष में इस्तेमाल करने की बात कही थी, परन्तु बाद में यही बंगला आवंटित होने और उसमें रहने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। श्री महतो ने विधानसभा तथा मीडिया से यह स्पष्ट पहले ही कहा था कि उन्हें चार करोड़ बत्तीस लाख रुपये मूल्य का सरकारी घर स्वीकार नहीं है और इसे नीलाम करके जो पैसा प्राप्त होगा वही छात्रों के छात्रवृत्ति में लगाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि सरकार को इस बंगले को नीलाम कर उसके पैसे छात्रों के हित में खर्च करने चाहिए। लेकिन बंगले में गृह-प्रवेश किया जाना और उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद राजनीतिक विरोधियों तथा आम लोगों में सवाल उठने लगे हैं कि विधायक ने अपने वादों के विपरीत सरकारी बंगला अपनाया है। कुछ लोगों का आरोप है कि उन्होंने शुरुआत में सरकारी आवास लेने से इंकार किया था, लेकिन अब चार करोड़ रुपये की लागत के इस बंगले में रहकर सियासी नाटकबाजी कर रहे हैं। दूसरी ओर विधायक के समर्थकों का दावा है कि महतो मूल रूप से गरीब पृष्ठभूमि से आते हैं और सरकारी सुविधाओं का विरोध उनके मूल वोट-आधार के लिए एक विचारधारा रही है। बंगले के सरकारी आवंटन को लेकर वे कहते हैं कि नियमों के मुताबिक उन्हें यह सुविधा मिली है और उन्होंने छात्रहित के मुद्दे पर अपनी पुरानी बात दोहराई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगले के मुद्दे पर उठे विरोध से महतो की छवि पर असर पड़ सकता है, खासकर तब जब उन्होंने विधानसभा में छात्रवृत्ति जैसे सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। विधायक ने पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे महंगे सरकारी आवास को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि ऐसे बंगले को नीलाम कर उसकी राशि छात्रों की छात्रवृत्ति या जनकल्याणकारी योजनाओं में लगाई जानी चाहिए। उस वक्त उनके इस बयान को सादगी और जनपक्षधरता के रूप में देखा गया था।

हालांकि अब यह चर्चा तेज है कि उन्हें आवंटित लगभग 4 करोड़ रुपये लागत वाले सरकारी बंगले में वे रह रहे हैं। विरोधियों का आरोप है कि पहले इंकार कर अब उसी बंगले में रहने का कदम राजनीतिक नाटकबाजी है और यह उनके पुराने बयान से मेल नहीं खाता।विपक्षी दलों का कहना है कि जनता के सामने सादगी की छवि पेश करना और बाद में सरकारी सुविधाओं का लाभ लेना दोहरी नीति दर्शाता है। उनका आरोप है कि यह जनता को भ्रमित करने की कोशिश है। विधायक के समर्थकों का कहना है कि सरकारी नियमों के तहत आवास आवंटित होना एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। उनका तर्क है कि आवास स्वीकार करना नियमों के अनुरूप है और इससे उनके जनहित के मुद्दों पर रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आगामी राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकता है, खासकर तब जब सादगी और पारदर्शिता उनकी सार्वजनिक छवि का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हो।

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