
मुखर संवाद के लिये व्यूरो रिपोर्टः-
रांची: राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने राज्य में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर संवैधानिक और कानूनी सवाल उठाते हुए कड़ा ऐतराज जताते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को दो टूक जवाब दिया है। सूचना आयुक्तों से संबंधित संबंधित फाइल राज्य सरकार को वापस कर दी है। राज्यपाल ने विशेष रूप से उन नामों पर आपत्ति जताई है जो सक्रिय राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं। राजभवन ने मुख्य सचिव को फाइल भेजते हुए इन नामों पर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने सूचना आयुक्त के लिए अनुशंसित पैनल को अनुमोदित नहीं किया। उन्होंने शुक्रवार को फाइल सरकार को लौटा दी। राज्यपाल ने लिखा है कि राजनीतिक दल के पदाधिकारी सूचना आयुक्त पद के लिए अर्हता पूरी नहीं कर रहे हैं।
इससे पहले 25 मार्च को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने अनुज सिन्हा, तनुज खत्री, अमूल्य नीरज खलखो और शिवपूजन पाठक का नाम चयनित कर राज्यपाल को भेजा था। इसमें अनुज सिन्हा पत्रकारिता के क्षेत्र से हैं, जबकि शेष तीनों विभिन्न पार्टियों के पदाधिकारी हैं। झामुमो, कांग्रेस और भाजपा के इन तीन नेताओं के नाम की अनुशंसा मिलने पर राजभवन ने विधिक राय मांग कर पूछा था कि क्या ये सूचना आयुक्त पद के लिए अर्हता पूरी करते हैं। विधिक राय में कहा गया कि ये अर्हता पूरी नहीं कर रहे हैं। इसको आधार बनाते हुए गवर्नर ने फाइल वापस लौटा दी। राज्यपाल ने अंजलि भारद्वाज के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिए गए आदेशों का भी उल्लेख किया है। संभावना व्यक्त की गई है कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन नहीं हुआ है। राज्यपाल ने विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों द्वारा राजभवन से की गई शिकायत और ज्ञापनों को भी संलग्न करते हुए सरकार को भेजा है। उल्लेखनीय है कि पूर्व सांसद रामटहल चौधरी, हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुनील महतो और उमाशंकर सिंह समेत राज्य के कई सूचनाधिकार कार्यकर्ताओं ने इन नामों पर विरोध जताया था।
आरटीआई एक्ट के अनुसार कुछ विशेष क्षेत्रों के विख्यात व्यक्ति ही आवेदक हो सकते हैं। इस संबंध में राज्य सरकार ने जो विज्ञापन निकाला है उसके अनुसार विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन तथा शासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाले समाज के प्रख्यात व्यक्ति ही आवेदक हो सकते हैं।
मुख्य सूचना आयुक्त के नाम की अनुशंसा न होना भी वजह मुख्य सूचना आयुक्त के नाम की अनुशंसा नहीं होना भी इसका एक कारण है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने केवल चार सूचना आयुक्तों के नाम की अनुशंसा की थी। उल्लेखनीय है कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में पांच सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की अनुशंसा राज्यपाल को भेजी गई थी। तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने यह कहते हुए वह फाइल लौटा दी थी कि बगैर मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के राज्य सूचना आयोग का गठन हो ही नहीं सकता। मुख्य सूचना आयुक्त के सेवानिवृत्त हो जाने की स्थिति में उस समय जो भी वरीय सूचना आयुक्त होंगे, वह कार्यकारी मुख्य सूचना आयुक्त हो सकते हैं। परंतु, ऐसा नहीं हो सकता कि बिना मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के केवल सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर दी जाए। तत्कालीन राज्यपाल की ओर से फाइल लौटाए जाने के बाद अर्जुन मुंडा सरकार के समय बनी चयन समिति ने फिर से मुख्य सूचना आयुक्त के नाम की अनुशंसा कर फाइल भेजी थी। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए फिर से बैठक होगी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता वाली चयन समिति में शामिल नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफीजुल हसन बैठक में शामिल होंगे। इस बैठक में नए नाम तय किए जाएंगे। ऐसी संभावना है कि इसके पहले कार्मिक विभाग की वेबसाइट पर सभी आवेदकों के नाम डाले जाएंगे, ताकि कोई पारदर्शिता न बरतने की शिकायत नहीं कर सके। तीन राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के नाम की अनुशंसा पर विवाद तेज हो गया था। सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि उक्त तीनों व्यक्ति सूचना आयुक्त के लिए निर्धारित अर्हता पूरी नहीं करते। जब अर्हता पूरी नहीं हो रही है, तो फिर इनके आवेदन पर कैसे विचार हुआ या इनके नाम की अनुशंसा कैसे हुई। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के संदर्भ में हो रही सुनवाई के क्रम में हाईकोर्ट ने 13 अप्रैल को सुनवाई की तिथि तय की है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को विश्वास दिलाया था कि 7 अप्रैल तक नियुक्ति के लिए अधिसूचना जारी हो जाएगी।
