
मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों बड़ा सियासी भूचाल देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अब गंभीर अंदरूनी संकट से जूझती नजर आ रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि, विधायकों की नाराजगी और हाल के घटनाक्रमों ने राजनीतिक गलियारों में इस चर्चा को तेज कर दिया है कि पार्टी में बड़ी टूट हो सकती है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के कई विधायक वर्तमान नेतृत्व की कार्यशैली से असंतुष्ट बताए जा रहे हैं। इसी बीच यह चर्चा भी तेज है कि लगभग 50 विधायक आज अपनी आगे की रणनीति को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय ले सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों की निगाहें पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। टीएमसी में संकट उस समय और गहरा गया जब पार्टी ने अपने दो विधायकों, संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को कथित ष्पार्टी विरोधी गतिविधियोंष् के आरोप में निष्कासित कर दिया। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि दोनों विधायकों ने संगठन के हितों के विरुद्ध कार्य किया, जिसके चलते यह कार्रवाई की गई।
दूसरी ओर, विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि टीएमसी के कई विधायक और सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं और वे भविष्य में बड़ा राजनीतिक कदम उठा सकते हैं। भाजपा सांसद सौमित्र खान ने हाल ही में दावा किया था कि बड़ी संख्या में टीएमसी विधायक और सांसद भाजपा के संपर्क में हैं। हालांकि टीएमसी ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे विपक्ष का राजनीतिक प्रचार बताया है। पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा उस समय और बढ़ गई जब हाल में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में बड़ी संख्या में विधायक अनुपस्थित रहे। इसके बाद विपक्ष ने दावा किया कि टीएमसी में नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद उभर आए हैं। वहीं पार्टी नेतृत्व ने अनुपस्थिति के पीछे विभिन्न स्थानीय कारणों का हवाला दिया है। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि उनकी पार्टी को तोड़ने की साजिश रची जा रही है और कुछ विधायकों पर दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से एकजुट रहने की अपील की है और इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन की भी घोषणा की है। फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या टीएमसी अपने भीतर के असंतोष को नियंत्रित कर पाएगी या फिर पार्टी को किसी बड़े राजनीतिक विभाजन का सामना करना पड़ेगा। आज संभावित रूप से होने वाले विधायकों के फैसले पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
