
मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
बेरमो/ रांची: इंटर के मजदूर नेता और कांग्रेस के दिग्गज विधायक रहे स्वर्गीय राजेंद्र सिंह की 6वीं पुण्यतिथि पूरे श्रद्धा के साथ राजधानी रांची और बोकारों सहित पूरे राज्य में कोयला मजदूरों के साथ कांग्रेस के नेताओं ने मनायी। राजेन्द्र सिंह को केवल कांग्रेस में ही नहीं बल्कि उनको बीजेपी और राजद में भी मानने वाले लोग थे। इंटक के मजदूर नेता और कांग्रेस के दिग्गज विधायक रहे स्वर्गीय राजेंद्र सिंह का जीवन संघर्ष, त्याग और मजदूर हितों के लिए निरंतर समर्पण की मिसाल रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वे हमेशा कोयला मजदूरों के लिए ही जिए और उन्हीं के लिए मरते रहे। उनका पूरा जीवन श्रमिक अधिकारों की रक्षा, अन्याय के खिलाफ संघर्ष और मजदूरों को सम्मान दिलाने में बीत गया। राजेंद्र सिंह ऐसे समय में मजदूर आंदोलन से जुड़े, जब कोयला क्षेत्र के मजदूर अत्यंत कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे थे। असुरक्षित खदानें, कम मजदूरी, ठेका प्रथा, और प्रबंधन की मनमानी आम बात थी। उस दौर में मजदूरों की आवाज़ बनना आसान नहीं था, लेकिन राजेंद्र सिंह ने जोखिम उठाकर यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली।
राजेन्द्र सिंह की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे मजदूरों के बीच से निकले नेता थे। वे न तो वातानुकूलित कमरों की राजनीति करते थे और न ही मंचीय भाषणों तक सीमित रहते थे। खदानों में जाकर मजदूरों की समस्याएँ सुनना, उनके साथ बैठकर खाना खाना और उनके दुख-सुख में सहभागी बनना उनकी पहचान थी। इसी कारण मजदूर उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि अपना साथी और अभिभावक मानते थे। चाहे बोनस का सवाल हो, वेतन समझौता हो, सुरक्षा उपकरणों की मांग हो या दुर्घटना में मारे गए मजदूरों के परिवार को मुआवज़ा दिलाने का मुद्दा-राजेंद्र सिंह हर मोर्चे पर डटे रहे। कई बार उन्हें प्रबंधन के दबाव, प्रशासन की सख्ती और राजनीतिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा, लेकिन वे कभी पीछे नहीं हटे। उनका मानना था कि कोयला मजदूरों का पसीना देश की अर्थव्यवस्था की नींव है, और यदि वही मजदूर असुरक्षित और उपेक्षित रहेंगे तो यह सामाजिक अन्याय होगा। झारखंड और बिहार की राजनीति तथा मजदूर आंदोलन में महत्वपूर्ण पहचान बनाने वाले इंटक के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद सिंह का जीवन संघर्ष, समर्पण और मजदूर हितों की लड़ाई का प्रतीक रहा है। उन्होंने कोयला मजदूरों के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया और क्षेत्रीय राजनीति में भी मजबूत पहचान बनाई।
स्व. राजेन्द्र प्रसाद सिंह का जन्म वर्ष 1945 में एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने मेहनत, अनुशासन और संघर्ष को अपने जीवन का आधार बनाया। बचपन आर्थिक तंगी में बीता। परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्हें कम उम्र में ही काम करना पड़ा। कहा जाता है कि उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में गांव-गांव और बाजारों में चूड़ी बेचकर अपने परिवार की मदद की। उस दौर में जीवन काफी कठिन था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। संघर्ष के इन्हीं दिनों ने उन्हें मेहनत, अनुशासन और लोगों की पीड़ा को समझने की सीख दी। कोयला क्षेत्र में मजदूरों की स्थिति देखकर उनके मन में सामाजिक काम करने की भावना और मजबूत होती गई। धीरे-धीरे वे मजदूरों के बीच सक्रिय होने लगे और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाने लगे। यही से उनका जुड़ाव भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) से हुआ। मजदूरों के हक के लिए उनके संघर्ष, स्पष्ट नेतृत्व और ईमानदार छवि के कारण वे जल्द ही मजदूरों के बीच लोकप्रिय हो गए। उन्होंने कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों की समस्याओं को मजबूती से उठाया। मजदूरी, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य अधिकारों को लेकर उन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत 1963 में मजदूर आंदोलन से की। इसी दौर में वे भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) से जुड़े और धीरे-धीरे कोयला मजदूरों के लोकप्रिय नेता बन गए। उनकी सक्रियता और नेतृत्व क्षमता के कारण वे जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने लगे। आगे चलकर वे इंटक के राष्ट्रीय महामंत्री बने और राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ (आरसीएमएस) के अध्यक्ष भी रहे।
मजदूर राजनीति में उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में भी मजबूत स्थान दिलाया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और बेरमो विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक चुने गए। वर्ष 1985 से 2005 तक वे लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। इसके अलावा वे वर्ष 2009 से 2014 और फिर 2019 में भी बेरमो से विधायक बने। झारखंड राज्य बनने के बाद भी वे राज्य की राजनीति में प्रभावशाली नेता बने रहे और वर्ष 7 जनवरी 2010 से 18 जनवरी 2013 तक झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में भी कार्य किया।
राजनीतिक जीवन में उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। अविभाजित बिहार में वर्ष 1989 में वे सरकार में मंत्री बने और लोक स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभाली। बाद में वर्ष 2000 में बिहार सरकार में उन्हें ऊर्जा मंत्री का दायित्व भी मिला। 2013 में जब हेमंत सोरेन ने पहली बार राज्य की बागडोर बतौर मुख्यमंत्री बने तो राजेन्द्र प्रसाद सिंह ही उनके राजनीतिक अभिभावक बनकर सामने आते थे। शिबू सोरेन हालंाकि जीवित थे लेकिन राजनीतिक संकटों के बीच राजेन्द्र बाबू ही उनको राजनीतिक समाधान निकालकर देते थे। राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने बतौर स्वास्थ्य मंत्री नर्साे के स्थायीकरण को लेकर स्वास्थ्य विभााग को मजबूती देने का काम भी किया था। राजद के साथ हेमंत सोरेन के मतभेदों को पाटने का काम भी उस सरकार में राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ही किया था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी उनको चाचा कहकर ही संबोधित करते थे।
मजदूरों के बीच वे एक ऐसे नेता के रूप में जाने जाते थे जो हर परिस्थिति में उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाते थे। कोयला मजदूरों के वेतन समझौते, सुरक्षा, आवास, चिकित्सा सुविधा और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। इसी कारण उन्हें कोयला मजदूरों का “मसीहा” भी कहा जाता था।
अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने मजदूर आंदोलन, ट्रेड यूनियन और राजनीति -तीनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका व्यक्तित्व सरल, मिलनसार और संघर्षशील था, जिसके कारण वे सभी दलों के नेताओं के बीच भी सम्मानित रहे। 24 मई 2020 को फेफड़ों के संक्रमण के कारण नई दिल्ली के एक निजी अस्पताल में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र 75 वर्ष थी। उनके निधन से झारखंड और कोयलांचल क्षेत्र की राजनीति तथा मजदूर आंदोलन को बड़ी क्षति हुई।
आज भले ही राजेंद्र सिंह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, संघर्ष और साहस कोयला मजदूर आंदोलन की अमिट विरासत बन चुके हैं। वे आने वाली पीढ़ियों के मजदूर नेताओं के लिए प्रेरणा स्रोत रहेंगे। जब भी मजदूर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाएँगे, राजेंद्र सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।
झारखंड की राजनीति और मजदूर आंदोलन के इतिहास में इंटक के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जीवन संघर्ष, मेहनत और सामाजिक सेवा का ऐसा उदाहरण है, जो आज भी लोगों को प्रेरित करता है। गरीबी और अभावों के बीच चूड़ी बेचने से शुरू हुआ उनका सफर अंततः उन्हें राज्य के मंत्री पद तक ले गया। मजदूरों के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने उन्हें राजनीति में भी एक मजबूत पहचान दिलाई। 1985 में वे बेरमो विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। विधायक बनने के बाद भी उन्होंने मजदूरों और आम जनता की समस्याओं को प्राथमिकता दी। उनके प्रयासों से क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास पर काम हुआ।
बेरमो विधानसभा क्षेत्र से विधायक बनने के बाद भी उन्होंने मजदूरों की लड़ाई को जारी रखा। विधायक के रूप में उन्होंने क्षेत्र के विकास और मजदूरों के कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण पहल कीं। उन्होंने सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के विकास पर विशेष ध्यान दिया। इसके साथ ही कोयला मजदूरों के परिवारों के लिए बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा में भी काम किया।
कोयला उद्योग में वेतन निर्धारण के लिए समय-समय पर कोयला वेतन समझौता किया जाता है, जिसे आमतौर पर कोल वेज एग्रीमेंट के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के माध्यम से मजदूरों के वेतन, भत्ते, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर निर्णय लिया जाता है। वेतन समझौते के दौरान कई बार परिस्थितियां ऐसी भी बनीं जब वार्ता प्रक्रिया ठहराव की स्थिति में पहुंच गई। ऐसे समय में राजेन्द्र सिंह ने मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए बातचीत को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। उन्होंने मजदूर संगठनों के बीच समन्वय स्थापित किया और प्रबंधन पक्ष के साथ सकारात्मक संवाद कायम रखने पर जोर दिया। इसी कारण कई बार लंबे समय से लंबित वेतन समझौतों को अंतिम रूप देने में सफलता मिली।
कोयला मजदूरों के हितों के लिए उनकी सक्रियता का परिणाम यह रहा कि कई समझौतों में मजदूरों के वेतन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, साथ ही चिकित्सा सुविधा, आवास, पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सुविधाओं में भी सुधार हुआ। मजदूरों का मानना है कि उनकी आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में स्वर्गीय राजेन्द्र सिंह की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। कोयला मजदूरों के लिए उनका संघर्ष और समर्पण हमेशा याद रखा जाएगा। कोयला मजदूरों के दिलों में वे हमेशा एक मसीहा के रूप में जीवित रहेंगे। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष और जीवन यात्रा लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। चूड़ी बेचने से लेकर मंत्री बनने तक का उनका सफर यह बताता है कि अगर इंसान के भीतर मेहनत, लगन और समाज के लिए काम करने का जज्बा हो, तो वह किसी भी ऊंचाई तक पहुंच सकता है।
