
मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांची: प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न आय वर्ग के परिवारों को रियायती दर पर उपलब्ध कराए गए आवासों के दुरुपयोग पर रांची नगर निगम ने बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। धुर्वा स्थित लाइट हाउस प्रोजेक्ट (एलएचपी) के 232 लाभुकों को नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर यह प्रमाण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है कि वे स्वयं अपने आवंटित फ्लैट में रह रहे हैं। निर्धारित समय में संतोषजनक जवाब नहीं मिलने या आवास के दुरुपयोग की पुष्टि होने पर संबंधित लाभुकों का आवंटन रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। नगर निगम की यह कार्रवाई उन लगातार शिकायतों के बाद हुई है, जिनमें आरोप लगाया गया था कि कई लाभुक सरकारी सब्सिडी पर मिले फ्लैटों में स्वयं नहीं रह रहे हैं, बल्कि उन्हें किराये पर देकर आर्थिक लाभ कमा रहे हैं। प्रारंभिक जांच में इन शिकायतों को सही पाए जाने के बाद निगम ने कड़ा रुख अपनाया है।
प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) का उद्देश्य वर्ष 2022 तक ष्सबके लिए आवासष् उपलब्ध कराना था। इस योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस), निम्न आय वर्ग (एलआईजी) और अन्य पात्र परिवारों को केंद्र एवं राज्य सरकार की सब्सिडी के माध्यम से किफायती आवास उपलब्ध कराए जाते हैं। धुर्वा का लाइट हाउस प्रोजेक्ट देश के उन छह आधुनिक आवासीय प्रोजेक्टों में शामिल है, जिन्हें नई निर्माण तकनीक के माध्यम से रिकॉर्ड समय में तैयार किया गया। इस परियोजना में बड़ी संख्या में लाभुकों को फ्लैट आवंटित किए गए ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। लेकिन अब सामने आ रही शिकायतों ने योजना की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या कहते हैं योजना के नियम
प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) की गाइडलाइन के अनुसार
आवंटित आवास में लाभुक को स्वयं निवास करना अनिवार्य है।
फ्लैट को किसी अन्य व्यक्ति को बेचा नहीं जा सकता।
आवास को किराये पर देना भी नियमों का उल्लंघन है।
नियमों के उल्लंघन की स्थिति में आवंटन निरस्त किया जा सकता है और कानूनी कार्रवाई भी संभव है। यही कारण है कि नगर निगम ने लाभुकों से बिजली बिल, आधार कार्ड, निवास संबंधी दस्तावेज अथवा अन्य साक्ष्य प्रस्तुत करने को कहा है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वे वास्तव में फ्लैट में रह रहे हैं।
नगर निगम की प्रारंभिक जांच में 232 लाभुकों पर नियम उल्लंघन का संदेह जताया गया है। यह संख्या इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल प्रारंभिक जांच का हिस्सा है। यदि आगे के सत्यापन में और अनियमितताएं सामने आती हैं तो नोटिस पाने वालों की संख्या बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी सब्सिडी पर बने आवास किराये का साधन बन जाएंगे तो वास्तविक जरूरतमंद परिवार आवास से वंचित रह जाएंगे। इससे योजना की विश्वसनीयता भी प्रभावित होगी। रांची नगर निगम का मानना है कि सार्वजनिक धन से संचालित योजनाओं का लाभ केवल पात्र और वास्तविक लाभुकों तक ही सीमित रहना चाहिए। इसी उद्देश्य से आवासों का भौतिक सत्यापन भी कराया जा रहा है। यदि जांच में आरोप सही पाए गए तो संबंधित फ्लैटों का आवंटन रद्द कर उन्हें पात्र प्रतीक्षा सूची के अन्य जरूरतमंद परिवारों को दिया जा सकता है।
शहरी विकास विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। भविष्य में समय-समय पर डिजिटल सत्यापन, फील्ड निरीक्षण, बिजली एवं पानी की खपत का विश्लेषण तथा स्थानीय स्तर पर सामाजिक ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू करनी होंगी, ताकि सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग रोका जा सके। रांची नगर निगम की यह कार्रवाई केवल 232 फ्लैटों तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि यह अभियान प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा तो इससे न केवल नियमों का पालन सुनिश्चित होगा, बल्कि सरकारी सब्सिडी का लाभ वास्तविक जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी।
