

’’मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः’’
रांची: बिहार के मधुबनी और दरभंगा का मखाना अब देश की सीमाओं से निकलकर वैश्विक बाजार में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मखाना को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने तथा इसके बाजार को विस्तार देने की पहल के बाद इस पारंपरिक कृषि उत्पाद की चर्चा लगातार बढ़ी है। मखाना की बढ़ती लोकप्रियता का असर अब झारखंड के बाजारों में भी दिखाई देने लगा है। राजधानी रांची में आयोजित जेसोवा मेले में रूपम मखाना लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। समाजसेवी रूपम झा के स्टॉल पर मखाना खरीदने के लिए लोगों की अच्छी-खासी भीड़ उमड़ रही है। खास बात यह है कि इसकी मांग केवल रांची तक सीमित नहीं है, बल्कि गुमला, सिमडेगा और पलामू जैसे जिलों से भी लोग यहां पहुंचकर खरीदारी कर रहे हैं।
जेसोवा मेले में विभिन्न उत्पादों और हस्तशिल्प के स्टॉल के बीच रूपम मखाना ने अपनी अलग पहचान बनाई है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और खानपान में पौष्टिक विकल्पों को शामिल करने की प्रवृत्ति ने मखाना की मांग को बढ़ाया है। लोग इसे स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ के रूप में पसंद कर रहे हैं। यही वजह है कि मेले में आने वाले खरीदार रूपम मखाना के स्टॉल पर पहुंचकर इसकी गुणवत्ता और उपलब्धता के बारे में जानकारी ले रहे हैं तथा खरीदारी भी कर रहे हैं।
’’बिहार की पहचान, झारखंड में बढ़ती लोकप्रियता’’
मधुबनी और दरभंगा का मखाना लंबे समय से अपनी गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में मखाना उत्पादन किसानों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार रहा है। अब इसके उत्पादन, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन को लेकर बढ़ती चर्चा ने इसे बड़े बाजार तक पहुंचाने की संभावनाएं मजबूत की हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मखाना को वैश्विक पहचान दिलाने की पहल और इसके निर्यात की संभावनाओं पर जोर दिए जाने से इस उत्पाद को लेकर देशभर में दिलचस्पी बढ़ी है। मखाना की खासियत यह है कि इसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ के साथ-साथ आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल पौष्टिक स्नैक्स के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। स्वास्थ्य के प्रति सजग लोग इसे अपने खानपान में शामिल कर रहे हैं। बाजार में इसकी बढ़ती मांग का एक कारण यह भी है कि लोग सामान्य तले-भुने स्नैक्स के विकल्प के रूप में मखाना को पसंद करने लगे हैं। इसके अलग-अलग उपयोग और स्वाद ने भी इसे विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया है।
’’रूपम झा के स्टॉल पर दूसरे जिलों से भी पहुंच रहे खरीदार’’
जेसोवा मेले में रूपम मखाना की मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रांची के अलावा दूसरे जिलों के लोग भी इसे खरीदने पहुंच रहे हैं। गुमला, सिमडेगा और पलामू से आने वाले खरीदारों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि झारखंड में मखाना के बाजार का दायरा बढ़ रहा है। समाजसेवी रूपम झा के स्टॉल पर लोगों की रुचि केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि वे मखाना की गुणवत्ता, पौष्टिकता और इसके इस्तेमाल के तरीकों के बारे में भी जानकारी ले रहे हैं। रूपम मखाना के प्रति लोगों का यह रुझान बताता है कि यदि पारंपरिक उत्पादों की गुणवत्ता, बेहतर प्रस्तुति और उचित विपणन पर ध्यान दिया जाए तो उन्हें बड़े बाजार में स्थापित किया जा सकता है। जेसोवा जैसे मेले इसके लिए महत्वपूर्ण मंच साबित हो रहे हैं। यहां उत्पादकों और विक्रेताओं को सीधे ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर मिलता है। वहीं खरीदारों को भी अलग-अलग उत्पादों की जानकारी और उन्हें परखने का मौका मिलता है।
’’महिला उद्यमिता और पारंपरिक उत्पादों को नया बाजार’’
जेसोवा मेले में रूपम मखाना की लोकप्रियता केवल एक खाद्य उत्पाद की बिक्री की कहानी नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक उत्पादों के लिए बाजार तैयार करने की संभावनाओं को भी सामने लाती है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलता है और छोटे कारोबारियों को अपनी पहचान बनाने का अवसर मिलता है। समाजसेवी रूपम झा की ओर से लगाए गए स्टॉल पर लोगों की बढ़ती दिलचस्पी इसी दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
बिहार के मिथिलांचल से निकलकर झारखंड के विभिन्न जिलों तक पहुंच बना रहा मखाना अब लोगों की बदलती खानपान की पसंद का हिस्सा बनता जा रहा है। जेसोवा मेले में रूपम मखाना की मांग यह भी दिखाती है कि पौष्टिकता, गुणवत्ता और बेहतर बाजार रणनीति के सहारे पारंपरिक उत्पादों को नई पहचान मिल सकती है। आने वाले समय में यदि इस तरह के उत्पादों के प्रचार-प्रसार और विपणन को लगातार बढ़ावा मिलता है, तो मखाना किसानों, कारोबारियों और महिला उद्यमियों के लिए भी नए अवसर पैदा कर सकता है।
