’’निलंबन से बहाली पर सवाल, क्या घोटालों के आरोपों के बाद फिर जिम्मेदारी पाना सामान्य है?’’ ’’शराब घोटाले में गिरफ्तारी के बाद आईएएस विनय चौबे निलंबन मुक्त, कार्मिक विभाग में दिया योगदान; छवि रंजन और पूजा सिंघल की बहाली को लेकर भी उठते रहे हैं सवाल’’

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मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची: झारखंड में भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरे अधिकारियों की प्रशासनिक वापसी को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। शराब घोटाले में गिरफ्तार किए गए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनय चौबे को राज्य सरकार ने निलंबन मुक्त कर दिया है। निलंबन से मुक्त होने के बाद उन्होंने कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग में योगदान दिया है। सरकार के इस निर्णय के बाद उनकी आगे की प्रशासनिक भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गयी हैं।
विनय चौबे की गिरफ्तारी शराब घोटाले से जुड़े मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की ओर से की गयी थी। उन पर शराब कारोबार की व्यवस्था में मैनपावर सप्लाई करने वाली कंपनियों के साथ कथित साजिश रचकर सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का आरोप लगा था। गिरफ्तारी के बाद राज्य सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया था। बाद में अदालत से जमानत मिलने के बाद वह जेल से बाहर आए। उनके खिलाफ इसके बाद दो अन्य मामले भी दर्ज किए गए, जिनमें अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर करीबी लोगों के नाम पर गलत तरीके से जमीन का म्यूटेशन कराने के आरोप लगाए गए हैं। अब सरकार की ओर से उन्हें निलंबन मुक्त किए जाने के बाद विपक्ष और आम लोगों के बीच यह सवाल उठ सकता है कि गंभीर आरोपों का सामना कर रहे अधिकारियों की प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने का आधार क्या होना चाहिए। हालांकि, निलंबन से मुक्ति का अर्थ किसी अधिकारी को अदालत द्वारा आरोपों से बरी किया जाना नहीं है। उनके खिलाफ चल रहे मामलों का अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

’’छवि रंजन की वापसी भी रही चर्चा में’’
झारखंड में प्रशासनिक अधिकारियों की बहाली को लेकर इससे पहले आईएएस अधिकारी छवि रंजन का मामला भी चर्चा में रहा है। जमीन घोटाले से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद छवि रंजन जेल गये थे। जेल से बाहर आने के बाद उन्हें सरकारी जिम्मेदारी दी गयी और वह खेल विभाग में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। उनके खिलाफ लगे आरोपों को लेकर न्यायिक प्रक्रिया अपनी जगह जारी है। छवि रंजन के मामले को लेकर भी समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि भ्रष्टाचार या अनियमितता के गंभीर आरोपों का सामना कर चुके अधिकारियों को दोबारा महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी देते समय सरकार किन मानकों को आधार बनाती है।
’’पूजा सिंघल की बहाली पर भी उठे थे सवाल’’
इसी तरह आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल का मामला भी झारखंड में भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा चर्चित प्रकरण रहा है। मनरेगा से जुड़े कथित घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद उनकी गिरफ्तारी हुई थी। जांच के दौरान उनके तत्कालीन चार्टर्ड अकाउंटेंट के परिसरों से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने की बात सामने आयी थी। ईडी की कार्रवाई में करीब 19.31 करोड़ रुपये की नकदी बरामद होने की जानकारी सामने आयी थी।
बाद में पूजा सिंघल को भी सरकार ने निलंबन से मुक्त किया और उन्हें फिर प्रशासनिक जिम्मेदारी दी गयी। उनकी बहाली और पदस्थापना को लेकर भी राजनीतिक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। उनके खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया का अंतिम परिणाम अभी न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर है।

’’जनता के पैसे की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल’’
इन मामलों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे अधिकारियों के मामले में जवाबदेही कैसे तय होगी। सरकार का खजाना जनता के पैसे से चलता है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी पर सरकारी धन को नुकसान पहुंचाने, भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगते हैं, तो जांच पूरी होने तक उसकी प्रशासनिक भूमिका को लेकर स्पष्ट और पारदर्शी नीति जरूरी है। निलंबन, बहाली और पदस्थापना प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन जनता यह जानना चाहती है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का अंतिम परिणाम क्या निकला। यदि आरोप साबित होते हैं तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और यदि आरोप साबित नहीं होते तो अधिकारी की प्रतिष्ठा भी स्पष्ट रूप से बहाल होनी चाहिए। विनय चौबे की निलंबन से मुक्ति के बाद एक बार फिर यही बहस सामने है कि क्या गंभीर आरोपों के बाद अधिकारी कुछ समय बाद फिर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में लौटते रहेंगे? यह सवाल केवल किसी एक अधिकारी का नहीं, बल्कि झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही, पारदर्शिता और जनता के धन की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

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