नियुक्ति में भ्रष्टाचार की जड़ें विधानसभा से निकलीं, जेपीएससी-जेडएसएससी तक पहुंचा संकट,सत्ता के गलियारों से भर्ती संस्थाओं तक सवाल, छात्र पूछ रहे- मेरिट का भरोसा कब लौटेगा

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मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांचीः झारखंड में सरकारी नौकरियों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर मौजूदा छात्र आंदोलन को केवल किसी एक परीक्षा या किसी एक आयोग की कथित गड़बड़ी तक सीमित करके देखना शायद इस पूरे विवाद की गंभीरता को कम करके आंकना होगा। राज्य गठन के बाद से ही नियुक्तियों की पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं। विडंबना यह है कि आरोपों की पहली बड़ी छाया उसी संस्था पर पड़ी, जहां राज्य के लिए कानून बनते हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं के संचालन का रास्ता तय होता हैकृझारखंड विधानसभा। इसके बाद यही सवाल झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और बाद में कर्मचारी चयन आयोग की नियुक्तियों तक पहुंचता गया। विधानसभा में नियुक्तियों को लेकर उठे विवाद और जेपीएससी के पुराने मामलों की जांच का इतिहास बताता है कि समस्या केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की नहीं है। असली सवाल चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता, राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप, संस्थागत जवाबदेही और जांच के बाद कार्रवाई का है। आज जब छात्र जेपीएससी और जेएसएससी की कथित अनियमितताओं के खिलाफ सड़क पर हैं, तब यह पूरा इतिहास फिर चर्चा के केंद्र में है।
झारखंड गठन के बाद विधानसभा के पहले अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी बने। उनके कार्यकाल में विधानसभा सचिवालय में नियुक्तियों की शुरुआत हुई। शुरुआती नियुक्तियों को लेकर ही यह आरोप सामने आया कि चतुर्थ वर्गीय पदों पर एक खास क्षेत्र, विशेषकर पलामू, के अभ्यर्थियों का अनुपात असामान्य रूप से अधिक रहा। बाद की नियुक्तियों में भी अनियमितता, पक्षपात और नियमों की अनदेखी के आरोप लगते रहे। विधानसभा में नियुक्तियों को लेकर विधायक सरयू राय ने भी गंभीर सवाल उठाये और जांच की मांग की। मामला आगे बढ़ा तो जांच समितियां गठित हुईं। आरोपों की जांच के दौरान प्रक्रिया में कई तरह की विसंगतियों की चर्चा सामने आई और स्वतंत्र एजेंसी से जांच की जरूरत भी बतायी गयी। लेकिन कार्रवाई के स्तर पर मामला आगे नहीं बढ़ सका।
बाद के वर्षों में विधानसभा नियुक्ति-प्रोन्नति मामले ने फिर तूल पकड़ा। राज्यपाल स्तर से जांच की पहल हुई और न्यायिक आयोग गठित किये गये। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति लोकनाथ प्रसाद की अध्यक्षता में 2013 में एक सदस्यीय आयोग बनाया गया था। आयोग ने काम शुरू किया, लेकिन विधानसभा सचिवालय से अपेक्षित सहयोग और दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की शिकायत के बाद न्यायमूर्ति लोकनाथ प्रसाद ने इस्तीफा दे दिया।

विक्रमादित्य आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई गंभीरता
इसके बाद सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति विक्रमादित्य प्रसाद की अध्यक्षता में दूसरा एक सदस्यीय आयोग गठित किया गया। इस आयोग को पहले आयोग की तुलना में अधिक शक्तियां दी गयीं। आयोग ने विधानसभा में हुई नियुक्तियों और प्रोन्नतियों की विस्तृत जांच की। रिपोर्ट में नियुक्ति प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के आरोपों का उल्लेख किया गया। मीडिया में उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने जरूरत से अधिक नियुक्तियां, चयन प्रक्रिया में पक्षपात और नियमों से हटकर लिये गये फैसलों जैसे मुद्दों को उठाया। रिपोर्ट में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्षों इंदर सिंह नामधारी और आलमगीर आलम सहित कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाये गये और कार्रवाई की अनुशंसा की गयी। 2018 में न्यायमूर्ति विक्रमादित्य प्रसाद ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को सौंपी। राज्यपाल ने रिपोर्ट विधानसभा अध्यक्ष को कार्रवाई के लिए भेजी। रिपोर्ट में उठाये गये सवालों और कार्रवाई की सिफारिशों के बावजूद मामला निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंचा। यही वह बिंदु है, जहां नियुक्ति में कथित गड़बड़ी से बड़ा सवाल संस्थागत जवाबदेही का बन गया। अगर किसी न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो उस पर कार्रवाई होगी या नहींकृयह तय करने की प्रक्रिया भी उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।
विक्रमादित्य आयोग की रिपोर्ट से जुड़े विवरणों में इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में रद्द किये गये एक विज्ञापन को दोबारा प्रभावी करने के लिए दी गयी कथित दलील का भी उल्लेख मिलता है। इस प्रसंग में श्खाट में खटमल पड़ जाने पर खाट नहीं जलाई जाती, खटमल निकाला जाता हैश् जैसी टिप्पणी चर्चा में रही। इसी के बाद रद्द किये गये विज्ञापन को पुनर्जीवित कर नियुक्तियां किये जाने का आरोप सामने आया। यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नियुक्ति प्रक्रिया में विज्ञापन, पदों की संख्या, आवेदन की अंतिम तिथि और चयन के निर्धारित मानदंड महज तकनीकी औपचारिकताएं नहीं हैं। यही वे सुरक्षा कवच हैं, जो किसी योग्य अभ्यर्थी के अधिकार और पूरी चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता को सुरक्षित रखते हैं। विक्रमादित्य आयोग की रिपोर्ट के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। विधानसभा की ओर से सरकार से कानूनी स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया गया। इसके बाद सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन हुआ। इसका उद्देश्य विक्रमादित्य आयोग की रिपोर्ट के बाद उत्पन्न कानूनी सवालों की जांच करना था। दिसंबर 2023 में झारखंड हाईकोर्ट को बताया गया कि न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय आयोग अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुका है और रिपोर्ट कैबिनेट के विचाराधीन है। इस बीच मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा। याचिका में 2005 से 2007 के बीच विधानसभा में हुई नियुक्तियों में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की गयी। सितंबर 2024 में हाईकोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया। अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि विक्रमादित्य आयोग की रिपोर्ट में 500 से अधिक नियुक्तियों में कथित गड़बड़ियों की जांच की गयी थी। हालांकि बाद में विधानसभा और राज्य सरकार की ओर से इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी और नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के सीबीआई जांच संबंधी आदेश पर रोक लगा दी। इसलिए विधानसभा नियुक्ति मामले को वर्तमान समय में सीधे सीबीआई जांच के अधीन बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

झारखंड विधानसभा के बाद राज्य की सबसे महत्वपूर्ण भर्ती संस्था जेपीएससी भी नियुक्तियों में कथित अनियमितताओं के आरोपों से अछूती नहीं रही। जेपीएससी की दूसरी सिविल सेवा परीक्षा को लेकर उठे आरोप इतने गंभीर हुए कि मामला पहले राज्य निगरानी विभाग और फिर सीबीआई तक पहुंचा। 2012 में झारखंड हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने जेपीएससी की विभिन्न परीक्षाओं की जांच शुरू की। दूसरी जेपीएससी परीक्षा से जुड़े मामले में तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप प्रसाद, आयोग के सदस्यों और चयनित अधिकारियों समेत कई लोगों को आरोपी बनाया गया। मामले की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप कुमार प्रसाद और सदस्य शांति देवी की गिरफ्तारी की खबरें सामने आयीं। बाद की न्यायिक प्रक्रिया में मामले के कई आरोपी अदालत में पेश हुए। 2024 में सीबीआई ने दूसरी जेपीएससी परीक्षा से जुड़े मामले में चार्जशीट दाखिल की, जिसमें 72 लोगों को आरोपी बनाया गया। यानी जिस संस्था से राज्य के प्रशासनिक ढांचे के लिए सबसे महत्वपूर्ण अधिकारियों का चयन होना था, उसी की चयन प्रक्रिया पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और केंद्रीय जांच एजेंसी तक मामला पहुंचा।
आज जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। 14वीं जेपीएससी संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा और अन्य भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्र परीक्षा रद्द करने और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं। आंदोलन के बीच विपक्ष ने भी सरकार को घेरते हुए सीबीआई जांच की मांग उठायी है, जबकि सरकार की ओर से जांच और कार्रवाई का भरोसा दिया जा रहा है। अगस्त 2026 के पहले सप्ताह में मामला विधानसभा के मानसून सत्र में भी राजनीतिक टकराव का प्रमुख मुद्दा बना। यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे का है। अगर किसी परीक्षा में एक भी अभ्यर्थी को यह संदेह हो जाए कि उसकी मेहनत से ज्यादा किसी और चीज का महत्व है, तो पूरी चयन व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। उनके लिए परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं, बल्कि रोजगार, परिवार और भविष्य की उम्मीद होती है।

झारखंड में नियुक्ति विवाद का इतिहास यह संकेत देता है कि इसे केवल वर्तमान सरकार बनाम विपक्ष के राजनीतिक चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। विधानसभा नियुक्तियों से लेकर जेपीएससी की पुरानी परीक्षाओं और अब जेएसएससी-जेपीएससी की नई शिकायतों तक एक पैटर्न दिखाई देता हैकृआरोप लगते हैं, जांच बैठती है, रिपोर्ट आती है और फिर कार्रवाई किसी न किसी कानूनी या प्रशासनिक पेच में उलझ जाती है। यही वजह है कि आज का छात्र आंदोलन केवल किसी एक परीक्षा का आंदोलन नहीं रह गया है। यह उस भरोसे की बहाली का सवाल बन गया है, जो सरकारी नौकरी की चयन प्रक्रिया में होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि नियुक्ति संस्थाओं को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने के साथ परीक्षा प्रक्रिया को तकनीकी और प्रशासनिक रूप से अधिक सुरक्षित बनाया जाए। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर प्रिंटिंग, परिवहन, परीक्षा केंद्र, ओएमआर, मूल्यांकन और परिणाम तक हर स्तर पर जवाबदेही तय हो। शिकायत मिलने पर समयबद्ध स्वतंत्र जांच हो और दोष साबित होने पर कार्रवाई भी उतनी ही तेजी से हो। झारखंड में सरकारी नियुक्तियों के विवाद का सबसे बड़ा सबक यही है कि भ्रष्टाचार केवल पैसे के लेन-देन का नाम नहीं है। नियमों को तोड़कर किसी को लाभ पहुंचाना, प्रक्रिया को कमजोर करना, शिकायतों पर कार्रवाई न करना और जांच रिपोर्ट को वर्षों तक लंबित रखना भी व्यवस्था के भरोसे को कमजोर करता है।
आज छात्रों की मांग केवल नौकरी नहीं, निष्पक्षता की गारंटी है। और यह गारंटी तभी लौटेगी, जब नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे हर सवाल का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, पारदर्शी जांच और ठोस कार्रवाई से दिया जाएगा।

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