

मुखर संवाद के लिये अशोक कुमार की रिपोर्टः-
रांची: झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य में बेहतर और अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को अक्सर दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। आम मरीजों के साथ-साथ राज्य के बड़े राजनीतिक परिवारों और जनप्रतिनिधियों के सामने भी जब गंभीर बीमारी के इलाज की स्थिति आती है, तो उन्हें दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता जैसे बड़े चिकित्सा केंद्रों पर निर्भर होना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि राज्य गठन के वर्षों बाद भी झारखंड में ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था क्यों नहीं विकसित हो सकी, जहां गंभीर बीमारियों का समुचित इलाज उपलब्ध हो।
राज्य के कई पूर्व और वर्तमान राजनीतिक नेताओं की बीमारी और इलाज के दौरान बाहर जाने की घटनाओं ने इस बहस को और तेज किया है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झामुमो के वरिष्ठ नेता शिबू सोरेन के इलाज के लिए भी राज्य से बाहर जाना पड़ा। वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन के इलाज को लेकर भी उन्हें बार-बार हैदराबाद जाना पड़ रहा है। इन घटनाओं ने राज्य की चिकित्सा व्यवस्था और खासकर गंभीर रोगों के इलाज की उपलब्धता पर चर्चा को जन्म दिया है।
’’चार मंत्रियों की मौत के बाद भी सवाल’’
राज्य की राजनीति में सक्रिय रहे चार मंत्रियों की अलग-अलग समय में हुई मौतों के बाद भी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। हालांकि, इन सभी मौतों को सीधे तौर पर बेहतर इलाज नहीं मिलने से जोड़ना चिकित्सकीय और आधिकारिक पुष्टि के बिना उचित नहीं होगा। लेकिन इन घटनाओं ने यह जरूर सवाल खड़ा किया है कि राज्य में गंभीर और जटिल बीमारियों के इलाज के लिए कितनी अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। झारखंड में रिम्स समेत कई सरकारी अस्पताल हैं, जहां बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज होता है। रिम्स राज्य का सबसे बड़ा सरकारी चिकित्सा संस्थान है और आसपास के राज्यों से भी मरीज यहां पहुंचते हैं। मरीजों की संख्या और उपलब्ध संसाधनों के बीच अंतर के कारण अस्पताल पर लगातार दबाव रहता है। विशेषज्ञ चिकित्सकों, अत्याधुनिक उपकरणों, प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ और सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
कैंसर, हृदय रोग, न्यूरो सर्जरी, अंग प्रत्यारोपण और कई जटिल बीमारियों के मामलों में मरीजों को अक्सर दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में जाना पड़ता है। इसका सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ता है। इलाज के खर्च के अलावा मरीज और परिजनों को बाहर रहने, आने-जाने तथा जांच की अतिरिक्त लागत भी उठानी पड़ती है।
झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य के सामने स्वास्थ्य क्षेत्र में आधारभूत ढांचे को मजबूत करने की बड़ी चुनौती है। जिला अस्पतालों को मजबूत करने, मेडिकल कॉलेजों में विशेषज्ञ सेवाएं बढ़ाने, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा गंभीर मरीजों के लिए रेफरल व्यवस्था को प्रभावी बनाने की जरूरत है।
’’सिर्फ भवन नहीं, विशेषज्ञ सेवाएं भी जरूरी’’
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि अस्पतालों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। आधुनिक मशीनें उपलब्ध होने के साथ उन्हें संचालित करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर, तकनीकी कर्मचारी और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ भी जरूरी हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्तर पर बीमारी की पहचान और समय पर रेफरल की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकारी अस्पतालों में सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं का विस्तार, विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति, आधुनिक जांच सुविधाओं की उपलब्धता और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। निजी क्षेत्र में भी गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा संस्थानों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को दूसरे राज्यों की ओर नहीं देखना पड़े। राजनीतिक नेताओं का इलाज बाहर होना अपने आप में स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन बार-बार सामने आने वाली ऐसी घटनाएं राज्य में गंभीर चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार की जरूरत जरूर रेखांकित करती हैं। सवाल यही है कि झारखंड के मरीजों को बेहतर इलाज के लिए कब तक राज्य की सीमाओं से बाहर जाना पड़ेगा।

