सामाजिक सरोकारों की मजबूत आवाज थे निर्भय सिंह,राम जन्मभूमि आंदोलन से लेकर काशीडीह दुर्गाेत्सव तक सामाजिक जीवन में रही अहम भूमिका,असामयिक निधन से जमशेदपुर में शोक की लहर

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मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
जमशेदपुर: लौहनगरी जमशेदपुर ने एक ऐसे सामाजिक व्यक्तित्व को खो दिया, जिसकी पहचान केवल एक संगठन के अध्यक्ष या किसी राजनीतिक परिवार के सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि समाज के बीच सक्रिय रहने वाले एक संवेदनशील और समर्पित कार्यकर्ता के रूप में थी। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अभय सिंह के बड़े भाई और सामाजिक कार्यकर्ता निर्भय सिंह का शुक्रवार को हृदयाघात से निधन हो गया। उनके असामयिक निधन की खबर से पूरे शहर में शोक की लहर दौड़ गई। सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोगों के बीच गहरा दुख व्याप्त है। उनके निधन से परिवार ने अपना एक मजबूत सहारा खो दिया, वहीं शहर ने सामाजिक गतिविधियों में हमेशा आगे रहने वाले एक सक्रिय व्यक्तित्व को खो दिया।
परिजनों के अनुसार, शुक्रवार की सुबह काशीडीह स्थित आवास पर निर्भय सिंह को अचानक सीने में तेज दर्द और घबराहट की शिकायत हुई। उनकी तबीयत बिगड़ते देख परिजन बिना देर किए उन्हें बिष्टुपुर स्थित टाटा मुख्य अस्पताल (टीएमएच) लेकर पहुंचे। अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती कराने के बाद चिकित्सकों ने उन्हें आईसीयू में रखा। चिकित्सकों की विशेष टीम ने उन्हें बचाने का हरसंभव प्रयास किया, लेकिन गंभीर हृदयाघात के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका। दोपहर में उनके निधन की पुष्टि होते ही परिवार और शुभचिंतकों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अस्पताल से लेकर काशीडीह स्थित उनके आवास तक लोगों का पहुंचना शुरू हो गया। हर कोई इस असमय हुई क्षति से स्तब्ध और दुखी नजर आया।

’’राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ी रही संघर्ष की स्मृतियां’’
निर्भय सिंह का परिवार जमशेदपुर के प्रतिष्ठित सामाजिक और धार्मिक परिवारों में गिना जाता है। वे विश्व हिंदू परिषद के पूर्व जिलाध्यक्ष दिवंगत ठाकुर धुरंधर सिंह के पुत्र थे। पिता के सामाजिक और धार्मिक संस्कारों का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव था। तीन भाइयों में अभय सिंह और दिलीप सिंह के साथ उन्होंने भी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1992 में अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान वे अपने पिता ठाकुर धुरंधर सिंह के साथ कारसेवा करने अयोध्या पहुंचे थे। उस दौर के घटनाक्रमों के बाद उन्हें महीनों तक कानूनी संघर्ष का सामना भी करना पड़ा था। यह उनके जीवन का ऐसा अध्याय रहा, जो उनके सामाजिक और धार्मिक जुड़ाव को दर्शाता है। उन्होंने अपने पिता से मिली सामाजिक सक्रियता की विरासत को आगे बढ़ाया और सार्वजनिक जीवन में अपनी अलग पहचान बनाई।
काशीडीह दुर्गाेत्सव को भव्य पहचान दिलाने में रही अहम भूमिका
निर्भय सिंह की पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष काशीडीह का दुर्गाेत्सव भी था। शहर के प्रतिष्ठित ठाकुर प्यारा सिंह-धुरंधर सिंह क्लब, काशीडीह के वे लंबे समय से अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में क्लब की ओर से आयोजित होने वाला भव्य दुर्गा पूजा पंडाल और महाभोग का आयोजन पूरे कोल्हान में अपनी अलग पहचान बना चुका है। दुर्गाेत्सव को लेकर उनकी सक्रियता केवल आयोजन की तैयारियों तक सीमित नहीं रहती थी, बल्कि वे इसे सामाजिक एकजुटता और सामूहिक सहभागिता का माध्यम मानते थे। काशीडीह दुर्गाेत्सव से जुड़े लोगों के लिए उनका निधन व्यक्तिगत क्षति जैसा है। धार्मिक आयोजनों और सामाजिक गतिविधियों में उनकी मौजूदगी से लोगों को एक ऐसा नेतृत्व मिलता था, जो सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास रखता था। उनके प्रयासों से क्लब की गतिविधियों को निरंतर मजबूती मिली।

’’अभय सिंह के राजनीतिक और सामाजिक सफर के रहे मजबूत संबल’’
निर्भय सिंह अपने छोटे भाई अभय सिंह के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। अभय सिंह के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक अभियानों में वे हमेशा मजबूती से साथ खड़े रहे। परिवार के भीतर उनका स्थान एक बड़े भाई के साथ-साथ मार्गदर्शक और संबल का भी था। सामाजिक मुद्दों पर निर्भीकता से अपनी राय रखना उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी। यही वजह थी कि राजनीतिक विचारधारा से अलग-अलग जुड़ाव रखने वाले लोग भी उनका सम्मान करते थे।
उनके निधन की सूचना मिलने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और शहर के गणमान्य लोगों ने गहरा शोक व्यक्त किया। भाजपा विधायक पूर्णिमा साहू भी शोक संतप्त परिवार से मिलने काशीडीह स्थित आवास पहुंचीं। उन्होंने अभय सिंह से मुलाकात कर उन्हें सांत्वना दी और इस कठिन घड़ी में परिवार के प्रति अपनी संवेदना प्रकट की। निर्भय सिंह का जाना केवल एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति नहीं है, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए भी बड़ा आघात है, जिन्होंने उनके साथ सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में समय बिताया था। पिता से मिली सामाजिक सक्रियता की विरासत, राम जन्मभूमि आंदोलन की स्मृतियां और काशीडीह दुर्गाेत्सव को नई पहचान दिलाने में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा। उनके असामयिक निधन से पैदा हुआ खालीपन सहजता से नहीं भरेगा। पीछे रह गई हैं उनसे जुड़ी यादें, सामाजिक कार्यों की छाप और उन लोगों की संवेदनाएं, जिनके जीवन में उन्होंने अपनी सक्रियता और आत्मीयता से जगह बनाई थी।

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