नामकुम के जय माता दी क्लब के पंडाल में दिख रहा मां-बेटे के प्रेम और संस्कार का अनूठा संगम,’’बिना चंदा पूजा आयोजन करने पर यादव एकता मंच ने क्लब अध्यक्ष विनोद सिंह यादव को किया सम्मानित’’

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मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांची: राजधानी रांची के नामकुम स्थित जय माता दी क्लब का दुर्गा पूजा पंडाल इन दिनों श्रद्धालुओं, खासकर महिलाओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पंडाल में मां और पुत्र के प्रेम को अनूठे ढंग से दर्शाया गया है। यहां स्थापित प्रतिमाएं केवल धार्मिक आस्था और भक्ति का संदेश नहीं दे रहीं, बल्कि मां की ममता, पारिवारिक रिश्तों और जीवन में संस्कारों के महत्व को भी बयां कर रही हैं। पंडाल के भीतर की सजावट और प्रतिमाओं के माध्यम से जन्म से लेकर बड़े होने तक मां और संतान के बीच के भावनात्मक रिश्ते को उकेरने का प्रयास किया गया है। मां की ममता, स्नेह, त्याग और बच्चों को अच्छे संस्कार देने में उनकी भूमिका को देखकर महिलाएं विशेष रूप से आकर्षित हो रही हैं। पंडाल की यह थीम श्रद्धालुओं को धार्मिक आस्था के साथ-साथ परिवार और सामाजिक मूल्यों पर भी विचार करने का संदेश दे रही है।

जय माता दी क्लब की ओर से पूजा आयोजन को केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक संदेश से जोड़ने की पहल की गई है। पंडाल में मां और बेटे के प्रेम का चित्रण इस बात को रेखांकित करता है कि किसी भी बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में मां की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। उनके दिए संस्कार ही आगे चलकर व्यक्ति के व्यवहार और जीवन की दिशा तय करते हैं।
’’बिना चंदा पूजा करने की पहल की सराहना’’
जय माता दी क्लब के अध्यक्ष विनोद सिंह यादव को पूजा आयोजन में एक अलग पहल के लिए यादव एकता मंच की ओर से सम्मानित किया गया। क्लब द्वारा बिना चंदा संग्रह किए दुर्गा पूजा का आयोजन किए जाने को लेकर मंच ने उनकी सराहना की। सम्मान के माध्यम से सामाजिक सहयोग, समर्पण और अपनी जिम्मेदारी पर धार्मिक आयोजन करने की भावना को प्रोत्साहित किया गया।

जय माता दी क्लब की यह पहल इस संदेश को भी सामने लाती है कि आस्था के आयोजन को इच्छाशक्ति, सामूहिक प्रयास और समर्पण के साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। एक ओर पंडाल मां की ममता और संस्कारों की महत्ता बता रहा है, तो दूसरी ओर बिना चंदा पूजा आयोजन की पहल सामाजिक जिम्मेदारी और सेवा भावना को उजागर कर रही है। नामकुम के जय माता दी क्लब का पंडाल इस तरह धार्मिक आस्था, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक सरोकारों का संगम बन गया है। यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पूजा के दर्शन के साथ-साथ पंडाल की थीम और उससे मिलने वाला संदेश भी खास आकर्षण बना हुआ है।

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