
मुखर संवाद के लिये शिल्पी यादव की रिपोर्टः-
रांची: एक रेलगाड़ी, एक रेलवे स्टेशन और अपमान की एक ऐसी घटना, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। दक्षिण अफ्रीका के पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पर एक भारतीय बैरिस्टर को रंगभेद के कारण ट्रेन से उतार दिया गया था। वह रात मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन में केवल अपमान की रात नहीं थी, बल्कि अन्याय के विरुद्ध एक ऐसे संघर्ष के जन्म की रात थी, जिसकी गूंज आगे चलकर भारत की स्वतंत्रता से लेकर दुनिया के अनेक आंदोलनों तक सुनाई दी। गांधी ने अपने अपमान को व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे हर उस इंसान के सम्मान का सवाल बना दिया, जिसके साथ रंग, जाति या पहचान के आधार पर भेदभाव होता है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रवीन्द्रनाथ महतो ने इसी ऐतिहासिक विरासत को याद करते हुए बापू के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। उनके लिए इस बार गांधी जयंती का अनुभव विशेष अर्थ रखता है। हाल ही में दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 69वें राष्ट्रमंडल संसदीय संघ सम्मेलन में भाग लेकर लौटे महतो ने गांधी से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों और आश्रमों का भ्रमण किया। वहां उन्होंने उन स्मृतियों को करीब से समझने का प्रयास किया, जिनमें एक साधारण मनुष्य के असाधारण बनने की कहानी दर्ज है। महात्मा गांधी की धरती को करीब से देखने के बाद अध्यक्ष रवीन्द्रनाथ महतो के शब्दों में गांधी की प्रासंगिकता केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता बनकर उभरती है। उन्होंने कहा कि बापू ने सत्य, अहिंसा और प्रेम के आग्रह से न केवल भारत को स्वतंत्रता का रास्ता दिखाया, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और मानवता का संदेश भी दिया।
डरबन से प्रिटोरिया तक की रेल यात्रा गांधी के जीवन का निर्णायक अध्याय बनी। पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पर उनके साथ हुआ भेदभाव उनके भीतर अन्याय के खिलाफ खड़े होने का संकल्प बन गया। उन्होंने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय सत्य और नैतिक साहस का रास्ता चुना। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध उनका संघर्ष आगे बढ़ा और सत्याग्रह ने अन्याय का प्रतिरोध करने का एक नया मानवीय तरीका दुनिया के सामने रखा।
रवीन्द्रनाथ महतो ने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्हें वहां आज भी भारतीयों के प्रति विशेष सम्मान का भाव महसूस हुआ। उनके अनुसार, इसके पीछे महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और मानवता के संस्कारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यह अनुभव बताता है कि किसी महान व्यक्तित्व की पहचान केवल उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहती; उसके विचार पीढ़ियों और भौगोलिक सीमाओं को पार करते हुए लोगों के मन में जगह बनाते हैं। गांधी का सपना केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाना नहीं था। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे, जहां गरीब को सम्मान मिले, वंचित को अवसर मिले, गांव आत्मनिर्भर बनें और विकास की रोशनी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। स्वदेशी, स्वच्छता, सामाजिक समरसता और सत्याग्रह उनके लिए केवल नारे नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण के आधार थे।
रवीन्द्रनाथ महतो ने कहा है कि आज गांधी जयंती पर उनके विचारों को याद करना इसलिए भी जरूरी है कि विकास की चर्चा के बीच मानवीय संवेदना, सामाजिक सद्भाव और कमजोर व्यक्ति के सम्मान का प्रश्न पीछे न छूट जाए। गांधी का संदेश हमें याद दिलाता है कि किसी समाज की वास्तविक प्रगति केवल उसकी आर्थिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जाती है कि वह अपने सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। श्री महतो ने भी गांधी जयंती को केवल श्रद्धांजलि का अवसर मानने के बजाय उनके आदर्शों को आचरण में उतारने के संकल्प से जोड़ने पर जोर दिया। जनसेवा, सामाजिक समरसता और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता ही बापू के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
उल्लेखनीय है कि दक्षिण अफ्रीका में सम्मेलन के बाद प्रकाशित ’सीपीसी बुलेटिन’ पत्रिका के कवर पेज पर झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रवीन्द्रनाथ महतो को भी स्थान दिया गया है। उनके दक्षिण अफ्रीका प्रवास ने गांधी के ऐतिहासिक संघर्ष को समझने का एक अवसर दिया और गांधी जयंती ने उस अनुभव को सार्वजनिक जीवन के मूल्यों से जोड़ने का संदेश दिया। महात्मा गांधी आज हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनका सत्य, उनकी अहिंसा और अन्याय के सामने न झुकने का साहस आज भी जीवित है। पीटरमैरिट्जबर्ग की वह घटना याद दिलाती है कि इतिहास बदलने के लिए हमेशा शक्ति और हथियारों की जरूरत नहीं होती; कभी-कभी सत्य के पक्ष में खड़ा एक अकेला मनुष्य भी पूरी दुनिया को नई दिशा दे सकता है।
